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मंगलवार, 17 जून 2014

"मन खुशियों से फूला" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

प्रस्तुत है-
यह मुक्तक-बाल कविता!
इसको अपना मधुर स्वर  दिया है-

मानसून का मौसम आया,
तन से बहे पसीना!
भरी हुई है उमस हवा में,
जिसने सुख है छीना!!

कुल्फी बहुत सुहाती हमको,
भाती है ठण्डाई!
दूध गरम ना अच्छा लगता,
शीतल सुखद मलाई!!

पंखा झलकर हाथ थके जब,
हमने झूला झूला!
ठण्डी-ठण्डी हवा लगी तब,
मन खुशियों से फूला!!

13 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस सुंदर रचना का उल्लेख अपने फेसबुक पन्ने पर किया है -
    मैं हिंदी भाषी हूं
    सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर...
    प्यारी सी रचना...

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  4. रचना पढ़ते हुए बचपन की यादें ताज़ा हो गई

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति.....बचपन को छूना हमेशा आरामदायक और यादों का स्रोत होता है.....|

    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  7. बढ़िया बाल गीत-
    शुभकामनायें आदरणीय-

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  9. सुन्दर रचना :
    मनभावन बंदिश :
    मानसून का मौसम आया,
    तन से बहे पसीना!
    भरी हुई है उमस हवा में,
    जिसने सुख है छीना!!

    कुल्फी बहुत सुहाती हमको,
    भाती है ठण्डाई!
    दूध गरम ना अच्छा लगता,
    शीतल सुखद मलाई!!

    पंखा झलकर हाथ थके जब,
    हमने झूला झूला!
    ठण्डी-ठण्डी हवा लगी तब,
    मन खुशियों से फूला!!

    उत्तर देंहटाएं

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