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बुधवार, 25 जून 2014

"ग़ज़ल-काठ की हाँडी चढ़ेगी कब तलक" (डॉ. रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक')

जिन्दगी आगे बढ़ेगी कब तलक
काठ की हाँडी चढ़ेगी कब तलक

लहर आयेगी बहा ले जायेगी सब
रेत में मूरत गढ़ेगी कब तलक

प्यार के सब रास्ते अवरुद्ध हैं
दोष अपने सर मढ़ेगी कब तलक

उस ओर गहरी खाई है चट्टान के
इस इबारत को पढ़ेगी कब तलक

खूबसूरत “रूप” पर सब हैं फिदा
जंग अस्मत की लड़ेगी कब तलक

5 टिप्‍पणियां:

  1. नयी पुरानी हलचल का प्रयास है कि इस सुंदर रचना को अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    जिससे रचना का संदेश सभी तक पहुंचे... इसी लिये आप की ये खूबसूरत रचना दिनांक 26/06/2014 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है...हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...

    [चर्चाकार का नैतिक करतव्य है कि किसी की रचना लिंक करने से पूर्व वह उस रचना के रचनाकार को इस की सूचना अवश्य दे...]
    सादर...
    चर्चाकार कुलदीप ठाकुर
    क्या आप एक मंच के सदस्य नहीं है? आज ही सबसक्राइब करें, हिंदी साहित्य का एकमंच..
    इस के लिये ईमेल करें...
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  2. जिन्दगी आगे बढ़ेगी कब तलक
    काठ की हाँडी चढ़ेगी कब तलक
    ....सच काठ की हांड़ी बार बार नहीं चढ़ती
    बहुत बढ़िया

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 26-06-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा -1655 में दिया गया है
    आभार

    उत्तर देंहटाएं

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