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शनिवार, 28 जून 2014

"दोहे-आया नहीं सुराज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



सबको अच्छे दिनों का, खूब दिखाया स्वप्न।
तीस दिनों में कर दिया, सबको बहुत विपन्न।१।
--
देखे जितने ख्वाब थे, सभी हो गये भंग।
सब कुछ मँहगा हो गया, बिगड़ा जीवन ढंग।२।
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शासन का रुख देख कर, मन में हुआ मलाल।
इस शासन ने कर दिया, जनजीवन बदहाल।३।
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नयी पौध को रोपकर, काटा चन्दन वृक्ष।
निर्धन-निर्बल का यहाँ, कौन सुनेगा पक्ष।४।
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हर-हर, घर-घर आ गया, आया नहीं सुराज।
जिससे खुशहाली बढ़े, नहीं मिला वो राज।५।
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कुटिल सुनामी आयी थी, बहा ले गयी चैन।
सुख के दिवस चले गये, आयी काली रैन।६।
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गंगा निर्मल हो भले, बहे भले जल-धार।
मँहगाई को देखकर, आहत है परिवार।७।

8 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार आदरणीय-

    उत्तर देंहटाएं
  2. अब पछताए होत का जब चिड़िया चुग गई खेत।

    उत्तर देंहटाएं
  3. अच्छे दिन आएंगे यह बात उन्होंने अपने लिए कहे थे जनता के लिए सोचने का वक़्त किसके पास है
    बहुत बढ़िया

    उत्तर देंहटाएं
  4. बढ़िया रचना व लेखन , आदरणीय धन्यवाद !
    ब्लॉग जगत में एक नए पोस्ट्स न्यूज़ ब्लॉग की शुरुवात हुई है , जिसमें आज आपकी ये पोस्ट चुनी गई है आपकी इस रचना का लिंक I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़ पर है , कृपया पधारें धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  5. सारगर्भित और सार्थक दोहे

    उत्तर देंहटाएं

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