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सोमवार, 16 जून 2014

"आम पेड़ पर लटक रहे हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आम पेड़ पर लटक रहे हैं।
पक जाने पर टपक रहे हैं।।
हरे वही हैं जो कच्चे हैं।
जो पीले हैं वो पक्के हैं।।
 इनमें था जो सबसे तगड़ा।
उसे हाथ में मैंने पकड़ा।। 
अपनी बगिया गदराई है।
आमों की बहार आई है।।
मीठे होते आम डाल के।
बासी होते आम पाल के।।
प्राची खुश होकर के बोली।
बाबा इनसे भर लो झोली।।
चूस रहे खुश होकर बच्चे।
आम डाल के लगते अच्छे।।

9 टिप्‍पणियां:

  1. चूसने वाले आम अब लग्जरी बन गए हैं...लालच लग रही है आपकी रचना के साथ फोटो देख के...

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  2. ताजे मीठे आम देखकर गांव की यादें ताजा हो गर्इं। बेहद सुंदर प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  3. रचना पढ़ते पढ़ते ही आम खाने की इच्छा हो गई है अत: मैं तो चला आम खाने.....

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत अच्छा ज़ी ...आम के मजें कुछ ओर है |

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुन्दर चित्रण-
    बढ़िया चित्र-
    आभार गुरूजी

    उत्तर देंहटाएं
  7. कितने सुन्दर चित्र ...आम का मौसम ..बहुत खूब अभिव्यक्ति ,बधाई आपको आ० शास्त्री जी

    उत्तर देंहटाएं
  8. बेहद खूबसूरत लग रही आपकी बगिया। २-२ लाईनो ने और भी रंग भर दिया। धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  9. चूस रहे खुश होकर बच्चे।
    आम डाल के लगते अच्छे।।
    मुझे भी बच्चों की तरह आम की गुठली चूसने में बड़ा मजा आता है
    अपने बाग़-बगीचे के आम की बात ही कुछ और है
    बहुत बढ़िया

    उत्तर देंहटाएं

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