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सोमवार, 4 अगस्त 2014

"पिता जी और मैं" संस्मरण शृंखला-2 (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)

संस्मरण शृंखला भाग-2
"पिता जी और मैं"
 गुरूकुल महाविद्यालयज्वालापुर (हरद्वार) से मैं कई बार भाग चुका था और घर आ जाता था। मगर पिता जी मुझे हर बार गुरूकुल छोड़ कर आ जाते थे। मैं अभी 4 दिन पहले ही तो गुरूकुल से भाग कर घर आया था। लेकिन पिता जी तो मानते ही नहीं थे । वे मुझे फिर ज्वालापुर गुरूकुल में लेकर चल दिये।
सुबह 10 बजे मैं और पिता जी गुरूकुल पहुँच गये।
संरक्षक जी ने पिता जी कहा- ‘‘इस बालक का पैर एक बार निकल गया हैयह फिर भाग जायेगा।’’
पिता जी ने संरक्षक जी से कहा-‘‘ अब मैंने इसे समझा दिया है। यह अब नही भागेगा।’’
मेरे मन में क्या चल रहा था। यह तो सिर्फ मैं ही जानता था। दो बातें उस समय मन में थीं कि यदि मना करूँगा तो पिता जी सबके सामने पीटेंगे। यदि पिता जी ने पीटा तो साथियों के सामने मेरा अपमान हो जायेगा। इसलिए मैं अपने मन की बात अपनी जुबान पर नही लाया और ऊपर से ऐसी मुद्रा बना लीजैसे मैं यहाँ आकर बहुत खुश हूँ। थोड़ी देर पिता जी मेरे साथ ही रहे। भण्डार में दोपहर का भोजन करके वो वापिस लौट गये।
शाम को 6 बजे की ट्रेन थीलेकिन वो सीधी नजीबाबाद नही जाती थी। लक्सर बदली करनी पड़ती थी। वहाँ से रात को 10 बजे दूसरी ट्रेन मिलती थी।
इधर मैं गुरूकुल में अपने साथियों से घुलने-मिलने का नाटक करने लगा। संरक्षक जी को भी पूरा विश्वास हो गया कि ये बालक अब गुरूकुल से नही भागेगा।
शाम को जैसे ही साढ़े चार बजे कि मैं संरक्षक जी के पास गया और मैने उनसे कहा- ‘‘गुरू जी मैं कपड़े धोने ट्यूब-वैल पर जा रहा हूँ।’’
उन्होंने आज्ञा दे दी। मैंने गन्दे कपड़ों में एक झोला भी छिपाया हुआ था। अब तो जैसे ही ट्यूब-वैल पर गया तो वहाँ इक्का दुक्का ही लड्के थेजो स्नान में मग्न थे। उनकी नजर जैसे ही बची, मैं रेल की लाइन-लाइन हो लिया। कपड़े झोले मे रख ही लिए थे।
ज्वालापुर स्टेशन पर पहुँच कर देखा कि पिता जी एक बैंच पर बैठ कर रेलगाड़ी के आने का इंतजार कर रहे थे। मैं भी आस-पास ही छिप गया।
जैसे ही रेल आयी-पिता जी डिब्बे में चढ़ गये। अब मैं भी उनके आगे वाले डिब्बे में रेल में सवार हो गया। लक्सर स्टेशन पर मैं जल्दी से उतर कर छिप गया और पिता जी पर नजर रखने लगा। कुद देर बाद वो स्टेशन की बैंच पर लेट गये और सो गये।
अब मैं आराम से टिकट खिड़की पर गया और 30 नये पैसे का नजीबाबाद का टिकट ले लिया। रात को 10 बजे गाड़ी आयी। पिता जी तो लक्सर स्टेशन पर सो ही रहे थे। मैं रेल में बैठा और रात में साढ़े ग्यारह बजे नजीबाबाद आ गया। नजीबाबाद स्टेशन पर ही मैं भी प्लेटफार्म की एक बैंच पर सो गया। सुबह 6 बजे उठ कर मैं घर पहुँच गया।
माता जी और नानी जी ने पूछा कि तेरे पिता जी कहाँ हैंमैं क्या उत्तर देता।
एक घण्टे बाद पिता जी जब घर आये तो नानी ने पूछा-‘‘रूपचन्द को गुरूकुल छोड़ आये।‘‘
पिता जी ने कहा-‘‘हाँबड़ा खुश थाअब उसका गुरूकुल में मन लग गया है।’’
तभी माता जी मेरा हाथ पकड़ कर कमरे से बाहर लायीं और कहा-‘‘ये कौन है?’’
इसके बाद किसी ने मुझे गुरूकुल में नहीं भेजा और नजीबाबाद में ही मिडिल स्कूल में दाखिला दिला दिया।
यह मेरी गुरूकुल की अन्तिम यात्रा थी।

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति आज मंगलवारीय चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  2. शास्त्री जी,

    मज़ेदार संस्मरण है।

    मेरा भी ज्वालापुर गुरुकुल में रहने का अनुभव रहा है। इसलिए आपके आने रहने भागने की फिल्म नज़रों के सामने घूम गई। मेरा मानना है - आपने भागकर गलती की। वहाँ की जलवायु, भोजन और शिक्षा सभी उत्तम रहे हैं।
    फिर भी जो होनहार है कहीं भी शिक्षा लेकर श्रेष्ठ (विद्वान) बन जाता है। मुझे लगता है पाठशाला से अधिक आपके परिवार संस्कारों ने आपको बनाया है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. भागने का किस्सा तो बड़ा रोचक है , हंसी आई ,वाकई एक बालक के मन की थाह भी नहीं पाई जा सकती . मुझे भी अपना हॉस्टल जेल जैसा लगता था , जबकि ऐसा नहीं था , बाल मन जो ढूँढ रहा होता है वो वहां नदारद होता है , माँ-बाप की सुखद छाया वहां नहीं मिलती ....आपके पिताजी की आत्मा को शांति प्राप्त हो ...

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  4. बहुत रोचक है आपके गुरुकुल से भागने का किस्सा...

    उत्तर देंहटाएं

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