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बुधवार, 20 अगस्त 2014

"ग़ज़ल-मासूम चेहरों से धोखा न खाना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


नहीं दिल्लगी कोई दिल को लगाना
सरल है मुहब्बत, कठिन है निभाना

सूरत छिपी हैं मुखौटों के पीछे
मासूम चेहरों से धोखा न खाना

बाहर से नाजुक हैं भीतर से पत्थर
अगर हो सके तो ज़िगर को बचाना

उमड़ते हैं ज़ज़्बात बनते हैं मिसरे
आसां नहीं उनको गाकर सुनाना

काँटों भरी है डगर आशिकी की
समझ-बूझकर ही कदम को बढ़ाना

मुहब्बत का कोई नहीं रूप होता
उल्फत के जंगल में बिखरा ख़जाना

9 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 21/08/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुंदर रचना , आ. धन्यवाद !
    आपकी इस रचना का लिंक दिनांकः 21 . 8 . 2014 दिन गुरुवार को I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़ पर दिया गया है , कृपया पधारें धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर और सार्थक अभिव्यक्ति
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    सादर ----

    उत्तर देंहटाएं

  4. मुहब्बत का कोई नहीं “रूप” होता
    उल्फत के जंगल में बिखरा ख़जाना


    मुहब्बत का कोई नहीं “रूप” होता
    उल्फत के जंगल में बिखरा ख़जाना

    बहुत खूब शाश्त्री जी

    मोहब्बत की राहों में चलना सम्भलके ,

    यहां जो भी आया गया हाथ मलके।

    उत्तर देंहटाएं

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