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शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

"शैल सूत्र में मेरी ग़ज़ल-बरखा-बहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


बादलों की कतार आयी है
आज बरखा-बहार आयी है

तिश्नगी मिट गयी लबों की अब
आसमां से फुहार आयी है

मिट गयीं सब दरार धरती की
अब तलैया में धार आयी है

दूर से चलके अपने आँगन मॆं
आज पुरवा-बयार आयी है

देख बारिश को आज नन्हीपरी
अपने कपड़े उतार आयी है

धान की पौध रोपने के लिए
गाँव भर से पुकार आयी है

अब सँवारा है “रूप” दरिया ने
मुद्दतों में पटार आयी है

4 टिप्‍पणियां:

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