"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

सोमवार, 11 अगस्त 2014

"सबके पथ का निर्माता" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

वो अनुगामी होगा कैसे?
जो सबके पथ का निर्माता।
ज्ञान-कर्म का मर्म बताता,
जीवन की भाषा समझाता।।

चन्दा में भी गरमी भर दे,
सूरज को भी शीतल कर दे,
जहाँ न पहुँचे रवि की किरणें,
लेकिन वो पल में हो आता।
ज्ञान-कर्म का मर्म बताता,
जीवन की भाषा समझाता।।

वही बहाता गंगा-सागर,
सबकी भरता खाली गागर.
वही सिखाता ढाई आखर,
वही प्यार को है उपजाता।
ज्ञान-कर्म का मर्म बताता,
जीवन की भाषा समझाता।।

सबका मालिक वो है एक,
लेकिन उसके नाम अनेक,
वो पूरी दुनिया पहचाने,
जग उसको पहचान न पाता।
ज्ञान-कर्म का मर्म बताता,
जीवन की भाषा समझाता।।

6 टिप्‍पणियां:


  1. बहुत सुन्दर रचना ईश आराधना जैसे अभिव्यक्ति को पंख लग गए हों। जय श्रीकृष्णा।

    उत्तर देंहटाएं
  2. अपनी मानसिक्ता बदलनी होगी। संघर्षमें आदमी अकेला होता है ये कहकर भगवानको आपने फिरसे अकेला कह दिया क्योकी सुना हुवा है जब कहीभी कुछभी नहिथा वही था वही था। आप(शरीर) छोडके तुम(इश्वर अपने शरीरका चेतन स्वरुप अपनी "सांसोको चलाने वाला जीसका साक्षातकार" कर लेना हरेक मनुष्यका पहला कर्तव्य है भगवानकीही सत्ता है और हम उससे अलग नहि जीसका अहेशास पल पल हमारे साथ या फिर सिर्फ वही है यही जीवनका उदेष्य हो) सो नर मुक्तिको फल पावे।

    उत्तर देंहटाएं
  3. आये हरेक मनुष्य धरती पर तब उसे समझ नहि होती। पर धरतीसे विदाय लेनेसे, जानेसे पहले समझ आजाती है और अगर समझ ऐसी हो जैसे गुरुजी कहते है के हरेक मनुष्य अपने आपको परमात्माही समझे तो यह धरती ही स्वर्ग बन जाये! और बात पल्ले पड गइ हो तो स्वयँ ही परमात्मा है समझने की जरुरत क्या है।

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails