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शनिवार, 23 अगस्त 2014

"फिर से हरा-भरा हुआ उजड़ा हुआ दयार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

2200वीं पोस्ट
मयंक
निन्यानबे के फेर में आया हूँ कई बार
रहमत औ’ करम ने तेरी, मुझको लिया उबार

ऐसे भी हैं कई बशर, अटक गये हैं जो
श्रम करके मैंने अपना, मुकद्दर लिया सँवार

कल तक थी जो कमी, वो पूरी हो गई है आज,
शबनम में आ गया है, मोतियों सा अब निखार

चलता ही रहा जो, वो पा गया है मंजिलें
पतझड़ के बाद आ गई, चमन में फिर बहार

नदियाँ मुकाम पा के, समन्दर सी हो गईं
थे बेकरार जो कभी, उनको मिला क़रार

महताब को दी रौशनी, जब आफताब ने,
बहने लगी है रात में, शीतल-सुखद बयार

चेहरा चमक उठा, दमक उठा है रूप भी
फिर से हरा-भरा हुआ, उजड़ा हुआ दयार

13 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर अभिव्यक्ति आदरणीय शास्त्री जी!
    धरती की गोद

    उत्तर देंहटाएं
  2. चलता ही रहा जो, वो पा गया है मंजिलें
    पतझड़ के बाद आ गई, चमन में फिर बहार
    .....बहुत सुन्दर चलना ही जिंदगी है .....

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, रविवार, दिनांक :- 24/08/2014 को "कुज यादां मेरियां सी" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1715 पर.

    उत्तर देंहटाएं
  4. फेर 99 का बहुत अच्छा होता है
    खुशकिस्मत होते हैं वे लोग
    जिनका 100 नहीं होता है ।
    बहुत सुंदर ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  6. निन्यानबे के फेर में आया हूँ कई बार
    रहमत औ’ करम ने तेरी, मुझको लिया उबार


    सुंदरम मनोहरं

    उत्तर देंहटाएं
  7. sundar aapka baal sahity sadaiv pyara lagta hai hardik badhai aapko

    उत्तर देंहटाएं

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