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शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

“आजादी की वर्षगाँठ” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


चौमासे में श्याम घटा जब आसमान पर छाती है।
आजादी के उत्सव की वो मुझको याद दिलाती है।।

देख फुहारों को उगते हैं, मेरे अन्तस में अक्षर,
इनसे ही कुछ शब्द बनाकर तुकबन्दी हो जाती है।

खुली हवा में साँस ले रहे हम जिनके बलिदानों से,
उन वीरों की गौरवगाथा, मन में जोश जगाती है।

लाठी-गोली खाकर, कारावास जिन्होंने झेला था,
वो पुख़्ता बुनियाद हमारी आजादी की थाती है।

खोल पुरानी पोथी-पत्री, भारत का इतिहास पढ़ो,
यातनाओं के मंजर पढ़कर, छाती फटती जाती है।

आओ अमर शहीदों का, हम प्रतिदिन वन्दन-नमन करें,
आजादी की वर्षगाँठ तो, एक साल में आती है।


11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुंदर रचना व प्रस्तुति , आ. शुभकामनाएं , धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही बढ़िया

    स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ !

    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही सार्थक प्रस्तुति। स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!

    उत्तर देंहटाएं
  4. यौमे आज़ादी को समर्पित बेहतरीन गीत। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत शानदार रचना |स्वतंत्रता दिवस पर हार्दिक शुभ कामनाएं |

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, रविवार, दिनांक :- 17/08/2014 को "एक लड़की की शिनाख्त" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1708 पर.

    उत्तर देंहटाएं
  7. वीर जवानों की क़ुरबानी की याद दिलाती सुंदर रचना..

    उत्तर देंहटाएं
  8. चौमासे में श्याम घटा,
    जब आसमान पर छाती है।
    आजादी के उत्सव की,
    वो मुझको याद दिलाती है।।

    खुली हवा में साँस ले रहे,
    हम जिनके बलिदानों से,
    उन वीरों की गौरवगाथा,
    मन में जोश जगाती है...
    उच्चारण

    उत्तर देंहटाएं
  9. सुंदर-बालगीत जैसा आजादी का गीत

    उत्तर देंहटाएं

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