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मंगलवार, 26 अगस्त 2014

"सबको सीधी राह बताओ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

चार उँगलियाँ और अँगूठा,
मिलकर बन जाता है घूँसा।
सुमन इकट्ठे रहें जहाँ पर,
वो कहलाती है मंजूषा।।

रंग-बिरंगे फूल जहाँ हो,
वही चमन अच्छा लगता है।
ममता-प्यार-दुलार करे जो,
वो साथी सच्चा लगता है।।

जन्मभूमि का मान बढ़ाये,
वो ही तो सपूत कहलाता।
खाये यहाँ का-गाये वहाँ का,
माता का वो दूध लजाता।।

फूलों की रक्षा करने को,
काँटे होते हैं उपवन में
इसीलिए तो तिरछी उँगली,
करनी पड़ती है जीवन में।

टेढ़ी उँगली मक्कारी की,
मजबूरी में ही अपनाओ।
सीधी उँगली से इंगित कर,
सबको सीधी राह बताओ।।

9 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर प्रस्तुति.

    सीधी अंगुली दिशा निर्देशित करती है.
    कभी कभार चेतावनी भी दे जाती है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर ।
    रविकर जी रचना चोरी करके ले जा रहे हैं चर्चा के लिये बच के :)

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के लिए चुरा ली गई है- चर्चा मंच पर ।। आइये हमें खरी खोटी सुनाइए --

      हटाएं
  3. टेढ़ी उँगली मक्कारी की,
    मजबूरी में ही अपनाओ।
    सीधी उँगली से इंगित कर,
    सबको सीधी राह बताओ।।

    बेहद सशक्त पंक्तियाँ शास्त्रीजी की। बढ़िया चर्चा मंच।

    उत्तर देंहटाएं

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