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रविवार, 24 अगस्त 2014

नेशनल दुनिया में मेरी बाल कविता "उल्लू" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आज 24 अगस्त, 2014 के
दिल्ली से प्रकाशित होने वाले समाचारपत्र
नेशनल दुनिया में मेरी बाल कविता "उल्लू"
प्रकाशित हुई है।
--
"उल्लू" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
--
उल्लू का रंग-रूप निराला।
लगता कितना भोला-भाला।।

अन्धकार इसके मन भाता।
सूरज इसको नही सुहाता।।

यह लक्ष्मी जी का वाहक है।
धन-दौलत का संग्राहक है।।

इसकी पूजा जो है करता।
ये उसकी मति को है हरता।।

धन का रोग लगा देता यह।
सुख की नींद भगा देता यह।।


सबको इसके बोल अखरते।
बड़े-बड़े इससे हैं डरते।।

विद्या का वैरी कहलाता।
ये बुद्धू का है जामाता।।

पढ़-लिख कर ज्ञानी बन जाना।
कभी न उल्लू तुम कहलाना।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. उल्लू पर लिखी गई अति सुन्दर बाल कविता

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 25/08/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

    उत्तर देंहटाएं
  3. उल्लू पर बहुत सुन्दर बाल रचना..
    प्रकाशन पर हार्दिक बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी इस रचना का लिंक दिनांकः 25 . 8 . 2014 दिन सोमवार को I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़ पर दिया गया है , कृपया पधारें धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  5. उल्लू पर लिखी गई अति सुन्दर बाल कविता.

    उत्तर देंहटाएं
  6. सत्यता समझ ली परछाई,
    कामुकता में वह छला गया।
    नही प्यास बुझी उस भँवरे की,
    इस दुनिया से वह चला गया।।

    विद्या का वैरी कहलाता।
    ये बुद्धू का है जामाता।।
    अरे भैया क्यों वाड्रा को कोसते हो मंदबुद्धि को इतनी खरी खोटी खाहे सुनाइबो

    सत्य वचन महाराज

    उत्तर देंहटाएं

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