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शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

"दोहे-मन है कितना खिन्न" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
दोहे सूर-कबीर के, रही दीमकें चाट।
भजन और सत्संग से, मन हो रहा उचाट।।
--
झीनी-झीनी चदरिया, लायें कहाँ से आज।
मँहगे कम्बल ओढ़ता, अब तो सकल समाज।।
--
तन पर लोगों के सजे, अब सिंथेटिक वस्त्र।
पाँवों में चप्पल नहीं, काँधे पर हैं शस्त्र।।
--
आज पुरानी नीँव के, खिसक रहे आधार।
नवयुग की इस होड़ में, बिगड़ गये आचार।।
--
बात-बात में निकलते, साला-साली शब्द।
देवनागरी हो रही, देख-देख निःशब्द।।
--
"रूप" देख सरकार का, मन है कितना खिन्न।
बाहर तो कुछ और है, लेकिन भीतर भिन्न।।
--
संसद में होता सदा, इंग्लिश का प्रयोग।
वोट माँगने के लिए, हिन्दी का उपयोग।।
--
लगने लगी समाज में, अंग्रेजी की होड़।
हिन्दी की शालाओं को, लोग रहे अब छोड़।।

9 टिप्‍पणियां:

  1. आज के यथार्थ को चित्रित करते बहुत सुन्दर दोहे...

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  2. वर्तमान यथार्थ का सुन्दर अनुरेखण,सादर

    भाषा लगड़ी हो गई भाव हो गए बहरे
    हिंदी की पीड़ा मत पूछो दर्द उठ रहे गहरे
    देखो ,अंग्रेजी का जय -जय गान हो रहा
    अपने ही घर में उतर गये हिंदी के चेहरे

    उत्तर देंहटाएं
  3. सत्य .....मन की बात को सरल ढंग से रखा

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेहद अच्छे ढंग से पीड़ा की अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  5. आज पुरानी नीँव के, खिसक रहे आधार।
    नवयुग की इस होड़ में, बिगड़ गये आचार।।
    - बिलकुल सच !

    उत्तर देंहटाएं
  6. झीने- झीने वस्त्र सब पहने आज समाज,
    महँगा कम्बल,नग्न तन क्या कहिये महाराज |

    उत्तर देंहटाएं

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