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दोहे सूर-कबीर के,
रही दीमकें चाट।
भजन और सत्संग से,
मन हो रहा उचाट।।
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झीनी-झीनी चदरिया,
लायें कहाँ से आज।
मँहगे कम्बल
ओढ़ता, अब तो सकल समाज।।
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तन पर लोगों के
सजे, अब सिंथेटिक वस्त्र।
पाँवों में चप्पल
नहीं, काँधे पर हैं शस्त्र।।
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आज पुरानी नीँव
के, खिसक रहे आधार।
नवयुग की इस होड़
में, बिगड़ गये आचार।।
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बात-बात में निकलते,
साला-साली शब्द।
देवनागरी हो रही,
देख-देख निःशब्द।।
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"रूप" देख सरकार का,
मन है कितना खिन्न।
बाहर तो कुछ और है,
लेकिन भीतर भिन्न।।
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संसद में होता
सदा, इंग्लिश का प्रयोग।
वोट माँगने के
लिए, हिन्दी का उपयोग।।
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लगने लगी समाज में,
अंग्रेजी की होड़।
हिन्दी की शालाओं
को, लोग रहे अब छोड़।।
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आज के यथार्थ को चित्रित करते बहुत सुन्दर दोहे...
जवाब देंहटाएंवर्तमान यथार्थ का सुन्दर अनुरेखण,सादर
जवाब देंहटाएंभाषा लगड़ी हो गई भाव हो गए बहरे
हिंदी की पीड़ा मत पूछो दर्द उठ रहे गहरे
देखो ,अंग्रेजी का जय -जय गान हो रहा
अपने ही घर में उतर गये हिंदी के चेहरे
सत्य .....मन की बात को सरल ढंग से रखा
जवाब देंहटाएंबेहद अच्छे ढंग से पीड़ा की अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंसटीक तीर :)
जवाब देंहटाएंआज पुरानी नीँव के, खिसक रहे आधार।
जवाब देंहटाएंनवयुग की इस होड़ में, बिगड़ गये आचार।।
- बिलकुल सच !
झीने- झीने वस्त्र सब पहने आज समाज,
जवाब देंहटाएंमहँगा कम्बल,नग्न तन क्या कहिये महाराज |
बहुत बढ़िया प्रस्तुति ..
जवाब देंहटाएंसुन्दर दोहे
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