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बुधवार, 31 दिसंबर 2014

"कल की बातें छोड़ो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

बीत रहा है साल पुराना, कल की बातें छोड़ो।
फिर से अपना आज सँवारो, सम्बन्धों को जोड़ो।।

आओ दृढ़ संकल्प करें, गंगा को पावन करना है,
हिन्दी की बिन्दी को, माता के माथे पर धरना है,
जिनसे होता अहित देश का, उन अनुबन्धों को तोड़ो।
फिर से अपना आज सँवारो, सम्बन्धों को जोड़ो।।

नये साल में पनप न पाये, उग्रवाद का कीड़ा,
जननी-जन्मभूमि की खातिर, आज उठाओ बीड़ा,
पथ से जो भी भटक गये हैं, उन लोगों को मोड़ो।
फिर से अपना आज सँवारो, सम्बन्धों को जोड़ो।।

मानवता की बगिया में, इंसानी पौध उगाओ,
खुर्पी ले करके हाथों में, खरपतवार हटाओ,
रस्म-रिवाजों के थोथे, अब चाल-चलन को तोड़ो।
फिर से अपना आज सँवारो, सम्बन्धों को जोड़ो।।

9 टिप्‍पणियां:

  1. शास्त्रीजी को नूतन वर्ष की मंगलमय कामनाएं !

    उत्तर देंहटाएं
  2. नूतन वर्ष पर हार्दिक शुभ कामनाएं आपको सपरिवार शास्त्री जी |

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुंदर । नव वर्ष पर मंगलकामनाऐं ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक चर्चा मंच पर वर्ष २०१५ की प्रथम चर्चा में दिया गया है
    नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुंदर.

    जो दर्द भरा था बीत गया उसको क्यों याद किया जाए
    सचमुच त्यौहार ही जीवन है ये त्यौहार जिया जाए
    जाने वाला वश में न था आने वाला तो वश में हो
    है नया वर्ष आने वाला सबको सुख और प्रेम दिया जाए

    ................आने वाले वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं !

    उत्तर देंहटाएं
  6. नूतन वर्ष की ढेरों शुभकामनायें।
    नव वर्ष मंगलमय हो।

    उत्तर देंहटाएं
  7. नव वर्ष पर सुन्दर नवगीत प्रस्तुति हेतु आभार!
    आपको सपरिवार नए साल की हार्दिक मंगलकामनाएं...
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  8. जाने वाला वश में न था आने वाला तो वश में हो
    है नया वर्ष आने वाला सबको सुख और प्रेम दिया जाए

    ................आने वाले वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं !

    उत्तर देंहटाएं

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