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रविवार, 7 दिसंबर 2014

"गीत-कुदरत का उपहार अधूरा होता है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


ममता का आधार न हो तो, प्यार अधूरा होता है।
निश्छल प्यार-दुलार बिना, परिवार अधूरा होता है।।

जिसके कारण चहक रही, घर में बच्चों की किलकारी,
नेह-नीर से सींच रही जो, नित्य-नियम से फुलवारी,
नारी के बिन तो सारा, घर-बार अधूरा होता है।।
निश्छल प्यार-दुलार बिना, परिवार अधूरा होता है।।

पत्नी-बहन और माता के, तुमने ही तो रूप धरे,
जगदम्बा बन कर तुमने, सबके खाली भण्डार भरे,
बिना धूप के सूरज का, आधार अधूरा होता है।
निश्छल प्यार-दुलार बिना, परिवार अधूरा होता है।।

जीवन में सुख देने वाला, तुम ही एक खिलौना हो,
खुली आँख से देखा जाने वाला, स्वप्न-सलोना हो.
बिना तुम्हारे कुदरत का, उपहार अधूरा होता है।
निश्छल प्यार-दुलार बिना, परिवार अधूरा होता है।।

5 टिप्‍पणियां:

  1. बिना तुम्हारे कुदरत का, उपहार अधूरा होता है।
    निश्छल प्यार-दुलार बिना, परिवार अधूरा होता है।।
    बहुत बढ़िया प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं
  2. प्यार तो निश्छल हो तभी सच्चा रह पाता है ... और उसके बिना सब कुछ अधूरा ही होता है ...
    सच लिखा है शास्त्री जी ...

    उत्तर देंहटाएं

  3. जिसके कारण चहक रही, घर में बच्चों की किलकारी,
    नेह-नीर से सींच रही जो, नित्य-नियम से फुलवारी,
    नारी के बिन तो सारा, घर-बार अधूरा होता है।।
    निश्छल प्यार-दुलार बिना, परिवार अधूरा होता है।।


    बहुत सुन्दर भाव आदरणीय

    उत्तर देंहटाएं

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