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बुधवार, 24 दिसंबर 2014

"कंजूस मधुमक्खी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


मधुमक्खी है नाम तुम्हारा।
शहद बनाना काम तुम्हारा।।

छत्ते में मधु को रखती हो।
कभी नही इसको चखती हो।।

कंजूसी इतनी करती हो।
रोज तिजोरी को भरती हो।।

दान-पुण्य का काम नही है।
दया-धर्म का नाम नही है।।

इक दिन डाका पड़ जायेगा।
शहद-मोम सब उड़ जायेगा।।

मिट जायेगा यह घर-बार।
लुट जायेगा यह संसार।।

जो मिल-बाँट हमेशा खाता।
कभी नही वो है पछताता।।

5 टिप्‍पणियां:

  1. कविराज है नाम तुम्हारा
    छंद बनाना काम तुम्हारा
    साँचों में रखते भावों को
    संचित वैचारिक दावों को
    लिंक संग्रह इतना करते हो
    रोज लिंक चर्चा करते हो।

    आलोचन का काम नहीं है
    किंचित भी विश्राम नहीं है
    इक दिन डाका पड़ जाएगा
    लिंक-थिंक सब उड़ जाएगा
    कॉपी-राइट वाला क़ानून
    हो जाएगा उसका खून।

    अन्य ब्लॉग जो टिप्पण लिखता
    कभी नहीं वो पंगत दिखता।

    आदरणीय मयंक जी, मेरा लोभ श्रेष्ठ बाल गीत कविता और कहानियों के संग्रह का रहता है और उन्हें बहुतायत में आपके यहाँ से लेकर बच्चों के बीच सुनाया करता हूँ। बहुत-बहुत उपकार है आपका।

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (26.12.2014) को "जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि" (चर्चा अंक-1839)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

    उत्तर देंहटाएं

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