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मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

"शीतल पवन बड़ी दुखदाई" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)


पवन बसन्ती बाट जोहती,
कब लेगा मौसम अँगड़ाई।
लहराते गेहूँ के बिरुए,
शीतल पवन बड़ी दुखदाई।।

पर्वत पर हिम जमा हुआ है,
निर्झर भी तो थमा हुआ है,
मार पड़ी सब पर कुहरे की,
सबकी होती हाड़ कँपाई।
लहराते गेहूँ के बिरुए,
शीतल पवन बड़ी दुखदाई।।

धरती पर शीतल छाया है,
सूरज नभ में शर्माया है।
शाखाएँ सुनसान पड़ी हैं,
कोई चिड़िया नज़र न आई।
लहराते गेहूँ के बिरुए,
शीतल पवन बड़ी दुखदाई।।

डरा हुआ उपवन का माली,
सिमट गयी है सब हरियाली,
देख दशा सुमनों की ऐसी,
भँवरों ने गुंजार मचाई।
लहराते गेहूँ के बिरुए,
शीतल पवन बड़ी दुखदाई।।

 लुप्त हुआ है "रूप" सलोना,
कुहरे का हैं बिछा बिछौना,
सहमी-सहमी सी मधुमक्खी,
भिन्न-भिन्न करके मँडराई।
लहराते गेहूँ के बिरुए,
शीतल पवन बड़ी दुखदाई।। 

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना मेरी अंतिम में पोस्ट दिन बुधवार 31 दिसम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं

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