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रविवार, 24 मई 2015

दोहे "किया बहुत उपकार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

जननी को शत्-शत् नमन

नारी होता में अगर, करने पड़ते काम। 
दिन में पलभर भी नहीं, मिल पाता आराम।१। 
--
मेरे सरल सुभाव पर, मिलता ये उपहार। 
सास-ननद देतीं मुझे, तानों की बौछार।२।
-- 
देते पग-पग पर मुझे, साजन भी सन्ताप। 
लेकिन महिला मित्र से, हँस-हँस करते बात।३। 
-- 
सहती ज़ुल्म समाज के, दुनिया भर में नार। 
अग्निपरीक्षा में गये, जीवन कई हजार।४।  
-- 
जातक जनने में मुझे, मिलता कष्ट अपार। 
सहनी होती वेदना, मुझको बारम्बार।५। 
-- 
बहुत-बहुत आभार है, जग के सिरजनहार। 
नर का मुझको रूप दे, किया बहुत उपकार।६। 
-- 
कहने को दुश्मन नहीं, लेकिन शत्रु हजार। 
जग की जननी नार को, अबला रहे पुकार।७। 
-- 
ममता का पर्याय है, दुनिया की हर नार। 
नारी तेरे “रूप” को, नतमस्तक शत् बार।८। 
-- 
नारी का अब तक नहीं, कोई बना विकल्प। 
करती है परिवार का, नारी काया-कल्प।९। 
-- 
नारी की महिमा करूँ, कैसे आज बखान। 
कम पड़ जाते शब्द हैं, करने को गुणगान।१०।

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