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सोमवार, 25 मई 2015

"लघु कथा-माँ की ममता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

लघु कथा
(माँ की ममता)
      बहुत दिनों से मेरे घर में नीचे की मंजिल पर एक छोटी बिल्ली रहती थी। वो मुझे देखकर अक्सर भाग जाती थी। इसलिए मैं उसके लिए रोज एक कटोरी दूध उसके आस-पास रख आता था। 2-3 दिनों के बाद वो मुझसे घुल-मिल गयी और बुलाने पर मेरे पास आ जाती थी। 
मैंने उसका नाम मोनी रखा था। मोनी अब मुझसे इतना प्यार करने लगी थी कि वो मेरी अनुपस्थिति में मेरी कुर्सी पर ही बैठी रहती थी और मेरे आने पर वो मेरी कम्प्यूटर टेबिल पर मॉनीटर के पास बैठ जाती थी।
   कालान्तर में नीचे की मंजिल में छज्जे के नीचे उसने दो बच्चों को जन्म दिया। जब बच्चे 15-20 दिन के हो गये तो उनकी आँखें खुल गयीं थी। और वो भी मुझे देखकर अपने पतले सुर में “म्याऊँ-म्याऊँ” करने लगे थे।
मेरे लोहे के मेनगेट के नीचे थोड़ी सी जगह है जिसमें से कुत्तों के पिल्ले कभी-कभी आँगन में आ जाते हैं। मोनी ने जब यह देखा तो उसे अपने बच्चों की चिन्ता सताने लगी और वो कल रात को एक-एक करके अपने बच्चों को मुँह में दबाकर ऊपर बने मेरे आवास पर ले आयी। यह होता है माँ क्या प्यार।
    एक बच्चा तो वो पहले ही ले आयी थी और उसने सीढ़ियों के नीचे बनी भण्डारी में रख दिया था। मगर जैसे ही वह दूसरे बच्चे को ला रही थी तो अन्धेरे में मुझे उसके मुँह में एक चूहा होने का आभास हुआ। मुझे देख कर वो ठिठक गयी। तब तक मैं उसे दो सन्टी जमा चुका था। मगर मार काकर भी वो भागी नहीं और “म्याऊँ-म्याऊँ” करती रही।
जब मैंने गौर से देखा तो उसके मुँह में उसका ही बच्चा था। मैंने मोनी-मोनी कहा तो उसने बच्चा जमीन पर रख दिया और भण्डारी की ओर जाने लगी। तभी मैंने उसके बच्चे को उठाया और उसके पीछे-पीछे चलने लगा। भण्डारी में मैंने झाँक कर देखा तो वहाँ उसका दूसरा बच्चा भी था।
मैंने उसके इस बच्चे को भी भण्डारी में रख दिया।
मोनी कृतज्ञता भरी नजरों से मुझे देख रही थी।

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