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मंगलवार, 5 मई 2015

दोहे "तोल-तोलकर बोल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जीवन ऐसा क्षेत्र है, जहाँ नहीं विश्राम।
परमारथ के काम को, करना आठों याम।।
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चलना ही है ज़िन्दग़ी, रुकना है अवसान।
 जब आती है रात तो, होता तब सुनसान।।
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खुशी बाँटने के लिए, जन्मा है इंसान।
चार दिनों की ज़िन्दग़ी, काहे का अभिमान।।
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साथ न जायेंगे कभी, आभूषण-परिधान।
जग का झंझावत में, केवल कर्म प्रधान।।
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रह जाती अच्छाइयाँ, मर जाने के बाद।
उनको ही करते सभी, दुनिया में सब याद।।
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वाक्शक्ति दी है हमें, ईश्वर ने अनमोल।
सोच समझकर शब्द को, तोल-तोलकर बोल।।
--
मानव चोले का दिया, ईश्वर ने उपहार।
आया है क्यों जगत में, करना ज़रा विचार।।

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