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रविवार, 24 मई 2015

"सत्य-अहिंसा वाले गुलशन बेमौसम वीरान हो गये" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
गुमनामों की इस बस्ती में
नेकनाम बदनाम हो गये! 
जो मक्कारी में अव्वल थे
वो ही अब सरनाम हो गये!

जो करते हैं दगा-फरेबी

उनको मिलता दूध-जलेबी
मानवता के सारे गहने
महफिल में नीलाम हो गये!

न्यायालय में न्याय बिक रहा

सरे-आम अन्याय टिक रहा
पंच और सरपंच अधिकतर
पक्के बे-ईमान हो गये!

नेता अभिनय सीख रहे हैं

दोराहों पर चीख रहे हैं
ऊपर से इन्सान लग रहे
भीतर से हैवान हो गये!

चौराहों से गांधी-बाबा

देख रहे हैं खून-खराबा
सत्य-अहिंसा वाले गुलशन
बेमौसम वीरान हो गये!

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