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शनिवार, 2 मई 2015

"बालक कितने प्यारे-प्यारे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 लड़ते खुद की निर्धनता से,
भारत माँ के राजदुलारे।
बीन रहे हैं कूड़ा-कचरा,
बालक कितने प्यारे-प्यारे।।
 
भूख बन गई है मजबूरी,
बाल श्रमिक करते मजदूरी,
झूठे सब सरकारी दावे,
इनकी किस्मत कौन सँवारे।
बीन रहे हैं कूड़ा-कचरा,
बालक अपने प्यारे-प्यारे।।
 
टूटे-फूटे हैं कच्चे घर,
नहीं यहाँ परपंखे-कूलर.
महलों को मुँह चिढ़ा रही है,
इनकी झुग्गी सड़क किनारे।
बीन रहे हैं कूड़ा-कचरा,
बालक अपने प्यारे-प्यारे।।
 
मिलता इनको झिड़की-ताना,
दूषित पानीझूठा खाना,
जनसेवक की सेवा में हैं,
अफसर-चाकर कितने सारे।
बीन रहे हैं कूड़ा-कचरा,
बालक अपने प्यारे-प्यारे।।

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