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गुरुवार, 7 मई 2015

ग़ज़ल "हाथों में उसके आज भी झूठा गिलास है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


दिल्ली उन्हीं के वास्ते, दिल जिनके पास है
खाली है अगर जेब तो, दिल्ली उदास है

चारों तरफ मची हुई है भाग-दौड़ सी
रिश्तो में अब मिठास के बदले खटास है

चलता है टेढ़ी चाल सियासत का पजामा
मैला है मन-बदन मगर उजला लिबास है

पद मिल गया तो देश की चिन्ता नहीं रही
कुर्सी की टाँग से बँधा अब तो विलास है

सागर में रह के मीन को मिनरल की चाह है
बुझती नहीं है आज मगर की पिपास है

रोजी के लिए नौनिहाल माँजता बरतन
हाथों में उसके आज भी झूठा गिलास है

वो देख रहा “रूप” को आजाद वतन के
नंगा है आज आदमी भूखा विकास है

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