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बुधवार, 8 अगस्त 2018

दोहे "राजनीति के सन्त" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बनी हुई सम्भावना, नियमित-नित्य अनन्त।
गली-हाट में बिक रहे, राजनीति के सन्त।

नेता बनकर कर रहे, लोग घिनौने काम।
इसीलिए तो हो रहा, लोकतन्त्र बदनाम।।

बाहर बने कपोत से, भीतर से सब काग।
मात्र दिखावे के लिए, अलग-अलग हैं राग।।

जब से सत्ता में बढ़ी, शैतानों की माँग।
मुर्गे पढ़ें नमाज को, गुर्गे देते बाँग।।

हुए नशे में चूर सब, पड़ी कूप में भाँग।
एक दूसरे की सभी, खीँच रहे हैं टाँग।।

केँचुलियों में ढक लिए, सबने काले दाग।
डसने को अब देश को, आये आदम नाग।।

  आज पिशाचों की हुई, दल-दल में भरमार।
थामी सबने हाथ में, छल-बल की पतवार।।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 9.8.18 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3058 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं

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