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सोमवार, 20 अगस्त 2018

दोहे "सीख सिखाते ज्येष्ठ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बहती गंगा झूठ की, गिरी सत्य पर गाज। 
पापकर्म बढ़ने लगे, दूषित हुआ समाज।।

लुप्त हुई है चेतना, सोया हुआ दिमाग। 
ओ भारत के आदमी, सुबह हुई अब जाग।।

बदल न पाये आज तक, निर्धन की तकदीर। 
सन्तों की हैं आज तो, झूठी सब तकरीर।।

सहजयोग की प्रेरणा, करती है कुलश्रेष्ठ। 
आओ जनम सुधार लें, सीख सिखाते ज्येष्ठ।।

जन-जीवन रक्षित रहे, मिटें यहाँ अन्याय। 
मिलकर करने चाहिए, सबको आज उपाय।।

1 टिप्पणी:

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