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शनिवार, 4 अगस्त 2018

दोहे "कभी न टूटे मित्रता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कभी न टूटे मित्रता, आओ लें संकल्प।
मित्र शब्द का आज भी, कोई नहीं विकल्प।।

कथा-कहानी मित्र की, होती बड़ी विचित्र।
कहलाती है मित्रता, पावन और पवित्र।।

सबसे पहले जाँचिए, उसका चित्त-चरित्र।
यदि गुण हों अनुकूल तब, उसे बनाओ मित्र।।

वो ही सच्ची मित्रता, जिसमें होता मेल।
गुड्डे-गुड़ियों का नहीं, इसको समझो खेल।।

मीत शब्द में है छिपा, दुनियाभर का प्यार।
मतलब में मत कीजिए, लोगों की मनुहार।।

आहत जो मन को करें, लिखो न ऐसे गीत।
वाणी में रस हो अगर, बन जाते सब मीत।।

सुबह-शाम भगवान से, माँगो सबकी खैर।
रखना मत संसार में, कभी किसी से बैर।।

मान सभी का कीजिए, अपने हों या गैर।
शूल जहाँ पर हों बिछे, वहाँ न रखना पैर।

ऐसे लोगों से बचो, जो करते उत्पात।
जिसको मीत बना लिया, करो न उससे घात।।

करते सदा परोक्ष में, जो दिल पर आघात।।
ऐसे लोगों से कभी, मत करना तुम बात।।

4 टिप्‍पणियां:

  1. इस पावन रिश्ते में भी मतलब-परस्ती घुस आई है

    उत्तर देंहटाएं
  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, हैप्पी फ्रेंड्शिप डे - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    उत्तर देंहटाएं

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