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गुरुवार, 30 अगस्त 2018

गीत "अपनी हिन्दी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अंग्रेजी भाषा के हम तो, 
खाने लगे निवाले हैं
खान-पान-परिधान विदेशी, 
फिर भी हिन्दी वाले हैं
अपनी गठरी कभी न खोली, 
उनके थाल खँगाल रहे
अपनी माता को दुत्कारा, 
उनकी माता पाल रहे
कुछ काले अंग्रेज, 
देश के बने हुए रखवाले हैं
वसुन्धरा-वन-खनिज और, 
गो-गंगा को भी लील रहे
कृत्रिम मँहगाई फैलाकर, 
जनता का तन छील रहे
खादी की केंचुलिया पहने, 
डसते विषधर काले हैं
इनकी कारा में भारत माँ, 
रोती और बिलखती है
डरी और सहमी हिन्दी, 
कोने में पड़ी सिसकती है
हिन्दी को अपनी बिन्दी के, 
पड़े हुए अब लाले हैं

गाँधी तेरे बन्दर अब भी, 
अन्धे-गूँगे-बहरे हैं
दूध-दही की रखवाली पर, 
बिल्लों के अब पहरे हैं
मत पाकर धनवान बने, 
अब सियासती मतवाले हैं

6 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ३१ अगस्त २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बिडम्बना है खान-पान सब विदेशी अपना लिया है हमने लेकिन उनकी अच्छी आदतें नहीं सीख पाए हैं अभी तक

    बहुत अच्छी प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर प्रस्तूति,आदरणीय शास्त्री जी।

    उत्तर देंहटाएं
  4. खरी बात! बहुत सटीक दोहे,
    अंग्रेज गये पर अंग्रेजी और अंग्रेजीयत यहीं साहबों वाली बघ्घी और उडन खटौलो पर घुम रही है।
    बहुत जानदार दोहे

    उत्तर देंहटाएं
  5. गाँधी तेरे बन्दर अब भी,
    अन्धे-गूँगे-बहरे हैं
    दूध-दही की रखवाली पर,
    बिल्लों के अब पहरे हैं...
    बहुत ही सटीक और करारा प्रहार आदरणीय... वाकई यह तंज़ अगर उन आस्तीन के उन साँपों को सुनाया जाय, तो अपनी केंचुली छोड़ने में भी शर्म महसूस करेंगे ये दोहरे चरित्र वाले.
    .श्रेष्ठ सृजन

    उत्तर देंहटाएं

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