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गुरुवार, 9 अगस्त 2018

दोहे "कर लेना कुछ गौर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

लोगों मेरी बात पर, कर लेना कुछ गौर।
ठण्डा करके खाइए, भोजन का हर कौर।।

अफरा-तफरी में नहीं, होते पूरे काम।
मनोयोग से कीजिए, अपने काम तमाम।।

कर्मों से ही भाग्य का, बनता है आधार।
कर्तव्यों के बिन नहीं, मिलते हैं अधिकार।।

देकर पानी-खाद को, फसल करो तैयार।
तब विचार से लाभ क्या, जब हो उपसंहार।।

बैरी की उसको नहीं, अब कोई दरकार।
जिसके घर को लूटते, उसके ही सरदार।।

3 टिप्‍पणियां:

  1. वैसे भी कहते हैं न, जल्दी का काम शैतान का !

    उत्तर देंहटाएं
  2. लोगों मेरी बात पर, कर लेना कुछ गौर।
    ठण्डा करके खाइए, भोजन का हर कौर।।

    अफरा-तफरी में नहीं, होते पूरे काम।
    मनोयोग से कीजिए, अपने काम तमाम।।

    कर्मों से ही भाग्य का, बनता है आधार।
    कर्तव्यों के बिन नहीं, मिलते हैं अधिकार।।

    देकर पानी-खाद को, फसल करो तैयार।
    तब विचार से लाभ क्या, जब हो उपसंहार।।

    बैरी की उसको नहीं, अब कोई दरकार।
    जिसके घर को लूटते, उसके ही सरदार।।

    शास्त्री जी के दोहों में है कुछ और ही बात ,

    बात में मिलती है नै ही कोई बात।

    नित्य पढ़ी दोहावली मिली नित्य सौगात ,

    क्या है अपनी दोस्तों बीतता भर औकात।
    veerujialami.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं

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