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रविवार, 12 अगस्त 2018

दोहे "सावन की है तीज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

सावन आया झूम के, रिमझिम पड़ें फुहार।
धानी धरती ने किया, हरा-भरा सिंगार।।

आते सावन मास में, कई बड़े त्यौहार।
उत्सव प्राणीमात्र के, जीवन के आधार।।

साजन सजनी के लिए, होते बहुत अजीज।
गिरिजा-शंकर का मिलन, याद दिलाती तीज।।

घर-आँगन झूले पड़े, सावन की है तीज।
बनते हैं इस वर्व पर, व्यंजन बहुत लजीज।।

मेंहदी हाथों में रचा, कितनी खुश हैं नार।
बिन्दी माथे पर लगा, रिझा रही भरतार।।

धान खेत में झूमते, चलता मस्त समीर।
झील-सरोवर, ताल में, भरा हुआ है नीर।।

चौमासे में गाँव की, चहक रही चौपाल।
काम-धाम कुछ भी नहीं, ठन-ठन है गोपाल।।

तन के शोधन के लिए, आवश्यक उपवास।
श्रवण-मनन के ही लिए, होता है चौमास।।  

2 टिप्‍पणियां:

  1. ये तीज आपकी खुशियाँ चौगुनी कर दे
    सुंदर दोहे।

    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत रहेगा

    उत्तर देंहटाएं
  2. शब्द प्रधान दोहावली में अर्थच्छटा भी देखते ही बनती है सावन के झूले और तीज संस्कृति के आँचल को संवारती सी शस्त्रीजी की दोहावली आप भी बांचिये :


    सावन आया झूम के, रिमझिम पड़ें फुहार।
    धानी धरती ने किया, हरा-भरा सिंगार।।

    आते सावन मास में, कई बड़े त्यौहार।
    उत्सव प्राणीमात्र के, जीवन के आधार।।

    साजन सजनी के लिए, होते बहुत अजीज।
    गिरिजा-शंकर का मिलन, याद दिलाती तीज।।

    घर-आँगन झूले पड़े, सावन की है तीज।
    बनते हैं इस वर्व पर, व्यंजन बहुत लजीज।।

    मेंहदी हाथों में रचा, कितनी खुश हैं नार।
    बिन्दी माथे पर लगा, रिझा रही भरतार।।

    धान खेत में झूमते, चलता मस्त समीर।
    झील-सरोवर, ताल में, भरा हुआ है नीर।।

    चौमासे में गाँव की, चहक रही चौपाल।
    काम-धाम कुछ भी नहीं, ठन-ठन है गोपाल।।

    तन के शोधन के लिए, आवश्यक उपवास।
    श्रवण-मनन के ही लिए, होता है चौमास।।
    veerujichiththa.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं

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