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मंगलवार, 14 जनवरी 2020

दोहे "उत्सव ललित-ललाम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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उत्तरायणी पर्व के, भिन्न-भिन्न हैं नाम।
आया लेकर हर्ष को, उत्सव ललित-ललाम।।
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गंगा में डुबकी लगा, पावन करो शरीर।
नदियों में बहता यहाँ, पावन निर्मल नीर।।
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जीवन में उल्लास के, बहुत निराले ढंग।
बलखाती आकाश में, उड़ती हुई पतंग।।
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सूर्य रश्मियाँ आ गयीं, खिली गुनगुनी धूप।
शस्य-श्यामला धरा का, निखरेगा अब रूप।।
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सूरज दादा भी नहीं, लेगा अब अवकाश।
छँठ जायेगी धुन्ध सब, चमकेगा आकाश।।
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अच्छे दिन अब निकट हैं, हुआ शीत का अन्त।
धीरे-धीरे चमन में, सजने लगा बसन्त।।
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रजनी आलोकित हुई, खिला चाँद रमणीक।
देखो अब आने लगे, युवा-युगल नज़दीक।।
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मौसम अच्छा हो गया, जीवित हुआ बसन्त।
नवपल्लव पाने लगा, अब तो बूढ़ा सन्त।।
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पौधों पर छाने लगा, कलियों का विन्यास।
दस्तक देता द्वार पर, खड़ा हुआ मधुमास।।
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