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शुक्रवार, 17 जनवरी 2020

विविध दोहे "माता करती प्यार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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चाहे कोई कल्प हो, या हो कोई काल।
माता निज सन्तान को, रही प्यार से पाल।।
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सुख-दुख दोनों में रहे, कोमल और उदार।
कैसी भी सन्तान हो, माता करती प्यार।।
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पीर पराई झेलना, बहुत कठिन है काम।
कलियुग में कैसे भला, पैदा होंगे राम।।
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भावनाओं के हृदय में, जब उठते तूफान।
उन्हें रोक पाना नहीं, होता है आसान।।
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जिसे समझ होती नहीं, कहो उसे नादान।
हो जिसमें सम्वेदना, वो होता इंसान।
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गंगा में चलती नहीं, कभी पाप की नाव।
वैसा फल मिलता उसे, जैसा होता भाव।।
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कच्ची माटी गूँथकर, दे देता आकार।
पात्र बनाने के लिए, गढ़ता उसे कुम्हार।।
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साबुत घड़ा कुम्हार का, देता है आवाज।
चटका घट देता नहीं, कभी सुरीला साज।।
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5 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा रविवार (१९-०१ -२०२०) को "लोकगीत" (चर्चा अंक -३५८५) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    -अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर और शिक्षाप्रद दोहे !

    जवाब देंहटाएं

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