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शुक्रवार, 17 जनवरी 2020

गीत "मन की बुझती नहीं पिपासा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


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कल-कल करती व्यास-विपाशा।
मन की बुझती नहीं पिपासा।।
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प्यास कहो या आस कहो तुम,
तृष्णा-इच्छा, लोभ निराशा,
पल-पल राग सुनाता मौसम,
जीवन में उगती अभिलाषा।
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तन की तृषा भले बुझ जाये,
लेकिन मन रहता है प्यासा,
कभी अमावस कभी चाँदनी,
दोनों करते खेल-तमासा।
मन की बुझती नहीं पिपासा।।
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पूजा करके, इष्ट देव को,
भोग लगाते लोग बतासा,
पाठन-पठन, मनन करने का,
सन्देशा देता चौमासा।
मन की बुझती नहीं पिपासा।।
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देश-काल अनुसार जगत में,
अलग-अलग होती परिभाषा,
संकट आने पर देते हैं,
सब सम्भाषण और दिलासा।
मन की बुझती नहीं पिपासा।।
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वतन-परस्ती हुई नदारत,
बदल गई है बोली-भाषा,
लोकतन्त्र अभिशाप बन गया,
रोग लगा है अच्छा-खासा।
मन की बुझती नहीं पिपासा।।
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3 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार (१८ -०१ -२०२०) को "शब्द-सृजन"- 4 (चर्चा अंक -३५८४) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    -अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  2. जी सचमुच मन की बुझती नहीं पिपासा।बेहद सुंदर और समृद्ध रचना ।अनुकरणीय।

    जवाब देंहटाएं

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