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रविवार, 26 जनवरी 2020

गीत "गणतन्त्र दिवस" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


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दशकों से गणतन्त्र दिवस परराग यही दुहराया है।
होगा भ्रष्टाचार दूरबस मन में यही समाया है।।
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सिसक रहा जनतन्त्र हमाराचलन घूस का जिन्दा है,
देख दशा आजादी कीबलिदानी भी शर्मिन्दा हैं,
रामराज के सपने देखेरक्षराज ही पाया है।
होगा भ्रष्टाचार दूरबस मन में यही समाया है।१।
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ये कैसा जनतन्त्रजहाँ पर जन-जन में बेकारी है,
जनसेवक तो मजा लूटतापर जनता दुखियारी है,
आज दलाली की दलदल मेंसबने पाँव फँसाया है।
होगा भ्रष्टाचार दूरबस मन में यही समाया है।२।
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आज तस्करों के कब्ज़े मेंनदियों की भी रेती है,
हरियाली की जगहखेत में कंकरीट की खेती है,
अन्न उगाने वालेदाता को अब दास बनाया है।
होगा भ्रष्टाचार दूरबस मन में यही समाया है।३।
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गाँवों की खाली धरती परचरागाह अब नहीं रहे,
बोलो कैसे अब स्वदेश मेंदूध-दही की धार बहे,
अपनी पावन वसुन्धरा परकाली-काली छाया है।
होगा भ्रष्टाचार दूरबस मन में यही समाया है।४।
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मुख में राम बगल में चाकूहत्या और हताशा है,
आशा की अब किरण नहीं हैचारों ओर निराशा है,
सुमन नोच कर काँटों सेक्यों अपना चमन सजाया है।
होगा भ्रष्टाचार दूरबस मन में यही समाया है।५।
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आयेगा वो दिवस कभी तोजब सुख का सूरज होगा,
पंक सलामत रहे ताल मेंपैदा भी नीरज होगा,
आशाओं से अभिलाषाओं कासंसार सजाया है।
दशकों से गणतन्त्र पर्व परराग यही दुहराया है।
होगा भ्रष्टाचार दूरबस मन में यही समाया है।६।
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3 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (27-01-2020) को 'धुएँ के बादल' (चर्चा अंक- 3593) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    ****
    रवीन्द्र सिंह यादव

    जवाब देंहटाएं
  2. मुख में राम बगल में चाकू, हत्या और हताशा है,
    आशा की अब किरण नहीं है, चारों ओर निराशा है,
    सुमन नोच कर काँटों से, क्यों अपना चमन सजाया है।
    होगा भ्रष्टाचार दूर, बस मन में यही समाया है।५।
    वाह!!!
    हमेशा की तरह बहुत लाजवाब।

    जवाब देंहटाएं
  3. आयेगा वो दिवस कभी तो, जब सुख का सूरज होगा
    पंक सलामत रहे ताल में, पैदा भी नीरज होगा

    बहुत खूब सर ,उम्मीद का दामन कभी ना छूटे ,जीवन में सकारात्मकता बनी रहती हैं ,सादर नमस्कार

    जवाब देंहटाएं

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