"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

फ़ॉलोअर

सोमवार, 12 अक्तूबर 2020

आलेख "ब्लॉगिंग एक नशा नहीं आदत है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
      कुछ प्रश्न मेरे मन में आज भी अनवरतरूप से चलते रहते हैं, और वो हैं कि मैं ब्लॉगिंग क्यों करता हूँ? न तो इसमें कोई पारिश्रमिक है और न ही कोई पारितोषिक है, फिर मैं प्रतिदिन अनवरतरूप से अपने 4-5 घण्टे क्यों नष्ट करता हूँ? तो मुझे इसका एक ही उत्तर मिलता है कि ‘‘ब्लॉगिंग एक नशा है?’’ जिस पर भाँति-भाँति की प्रतिक्रियाएँ टिप्पणी के रूप में मुझे उपहार में उपहार में मिलती हैं।
    अगर अपने मन की बात कहूँ तो  ब्लॉगिंग एक नशा नहीं बल्कि आदत है तो कुछ गलत नहीं होगा। लोग भाँति-भाँति आदतो से ग्रस्त रहते हैं उससे तो अच्छा यह ही है कि मैं एक रचनात्मक कार्य करता हूँ इसका सबसे बड़ा लाभ तो यह है कि लोगों की समस्याओं में उलझने से मैं बच जाता हूँ।
      शब्द अजर और अमर हैं। सबसे अच्छी बात तो यह है कि गूगल देवता इन्हे सहेज भी लेता है। जो एक ब्लॉगर के देहान्त होने के बाद भी जीवित रहेंगे, शायद युगों-युगों तक....युगों-युगों तक...।
   मेरी दिनचर्या रोज सुबह एक लोटा जल पीने से शुरू होती है। उसके बाद नेट खोलकर लैप-टाप या कम्प्यूटर में मेल चैक करता हूँ। इतनी देर में प्रैसर आ जाता है तो शौच आदि से निवृत हो जाता हूँ। प्रैसर आने में यदि देर लगती है तो दो-तीन मिनट में ही कुछ शब्द स्वतः ही आ जाते हैं और एक रचना का रूप ले लेते हैं। मैं क्या लिखता हूँकैसे लिखता हूँयह मुझे खुद भी पता नही लगता। ब्लॉग पर मैंने क्या लिखा हैइसका आभास मुझे तब होता है जब आप लोगों की प्रतिक्रियाएँ मिलतीं हैं।
       बारह साल पूर्व तो कापी-कलम संभाल कर लिखता था। एक-एक लाइन को कई-कई बार काट-छाँटकर गढ़ने की कोशिश करता था। महीना-पन्द्रह दिन में एक आधी रचना लिख गई तो अपने को धन्य मान कर अपनी पीठ थप-थपा लिया करता था। परन्तुजब से नेट चलाना आ गया है। तब से कापी कलम को हाथ भी नही लगाया है।
      नेट-देवता की कृपा से और माँ सरस्वती के आशीर्वाद से प्रतिदिन-प्रतिपल भाव आते हैं और आराम से ब्लाग पर बह जाते हैं।
      बारह वर्ष पूर्व उस समय के ब्लॉगिंग के पुरोधा  ताऊ रामपुरिया उर्फ पी0सीमुद्गल ने मेरा साक्षात्कार लिया था तो मुझसे एक प्रश्न किया था कि आप ब्लॉगिंग का भविष्य कैसा देखते हैं? उस समय तो यह आभास भी नही था कि इस प्रश्न का उत्तर क्या देना है?
      बस मैंने तुक्के में ही यह बात कह दी थी कि- ब्लॉगिंग का भविष्य उज्जवल है।
    लेकिनआज मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि ब्लॉगिंग का भविष्य उज्जवल है और यह एक नशा नही बल्कि एक आदत है।
      इसका सबसे बड़ा लाभ तो यह मिला कि दुनिया भर के साहित्यिक लोगों से मिलने काउनके विचार जानने का और अपने विचारों को उन तक पहुँचाने का मुझे अवसर मिला और यह सब ब्लॉगिंग के से ही सम्भव हो पाया है। जिसके कारण मेरे नाम को और मेरे शहर के नाम को पूरा संसार जान गया है।
     यदि मेरे इस आलेख से नवोदित ब्लॉगरों को किंचितमात्र भी प्रेरणा मिलेगी तो मैं अपने को धन्य समझूँगा।
     अन्त में एक पुरानी रचना से अपने आलेख का समापन करता हूँ-
नही जानता कैसे बन जाते हैं,
मुझसे गीत-गजल।
जाने कब मन के नभ पर,
छा जाते हैं गहरे बादल।।

ना कोई कापी या कागज,
ना ही कलम चलाता हूँ।
खोल पेज-मेकर को,
हिन्दी टंकण करता जाता हूँ।।

देख छटा बारिश की,
अंगुलियाँ चलने लगतीं है।
कम्प्यूटर देखा तो उस पर,
शब्द उगलने लगतीं हैं।।

नजर पड़ी टीवी पर तो,
अपनी हरकत कर जातीं हैं।
चिड़िया का स्वर सुन कर,
अपने करतब को दिखलातीं है।।
 
बस्ता और पेंसिल पर,
उल्लू बन क्या-क्या रचतीं हैं।
सेल-फोन, तितली-रानी,
इनके नयनों में सजतीं है।।
 
कौआ, भँवरा और पतंग भी,
इनको बहुत सुहाती हैं।
नेता जी की टोपी,
श्यामल गैया बहुत लुभाती है।।
 
सावन का झूला हो,
चाहे होली की हों मस्त फुहारें।
जाने कैसे दिखलातीं ये,
बाल-गीत के मस्त नजारे।।
 
मैं तो केवल जाल-जगत पर,
इन्हें लगाता जाता हूँ।
क्या कुछ लिख मारा है,
मुड़कर नही देख ये पाता हूँ।।
 
जिन देवी की कृपा हुई है,
उनका करता हूँ वन्दन।
सरस्वती माता का करता,
कोटि-कोटि हूँ अभिनन्दन।।
समाप्त...!

9 टिप्‍पणियां:

  1. इसी तरह नवोदित चिट्ठाकारों के प्रेरणा श्रोत बने रहें। आभार। शुभकामनाएं।

    जवाब देंहटाएं
  2. सादर नमस्कार ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (13-10-2020 ) को "अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर एक मां की हुंकार..."(चर्चा अंक 3853) पर भी होगी,आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    ---
    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
  3. ब्लॉगर और ब्लागिंग आपके सदा एहसानमंद रहेंगे

    जवाब देंहटाएं
  4. आप सदैव ब्लॉगगिंग के क्षेत्र में नये आयाम स्थापित करते रहें व नवोदित ब्लॉगगर्स के प्रेरणास्त्रोत बने रहें ।

    जवाब देंहटाएं
  5. आप इसी तरह नवोदित ब्लॉगरों के प्रेरणा स्त्रोत बने रहे और अपनी रचनाओं के माध्यम से उनका मार्गदर्शन करते रहे।

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत ही सुंदर है सर आप अनवरत ऐसे ही लिखते रहे और हमारा मार्गदर्शन करते रहे।
    सादर प्रणाम

    जवाब देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails