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मंगलवार, 13 अक्तूबर 2020

ग़ज़लिका "रूप को अपने नवल कैसे करूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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भाव अपनी ग़ज़ल में कैसे भरूँ
शब्द को अपने गरल कैसे करूँ
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फँस गया अपने बुने ही जाल में
रास्ता अपना सरल कैसे करूँ
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तिश्नगी से कण्ठ सूखा जा रहा
आचमन देकर तरल कैसे करूँ
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ज़िन्दगी में चाह है, ना राह है
चश्म को अपनी सजल कैसे करूँ
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तन-बदन में पड़ गयीं है झुर्रियाँ
“रूप” को अपने नवल कैसे करूँ
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9 टिप्‍पणियां:

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