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बुधवार, 28 अक्तूबर 2020

दोहा "ग्वाले हैं भयभीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

नौका में छल-छद्म की, मतलब के सब मीत। 
कृष्ण-सुदामा सी नहीं, आज जगत में प्रीत।।
--
मिलते हैं संसार में, भाँति-भाँति के लोग।
होती तब ही मित्रता, जब बनता संयोग।।
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कर्मों के अनुसार ही, मिलता सबको भोग।
खुद के बस में है नहीं, विरह और संयोग।।
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नहीं सरल है सीखना, जीवन का संगीत।
शब्दों के ही भार से, बनता सुन्दर गीत।।
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रक्खो कदम जमीन पर, मत उड़ना बिन पंख।
जो पारंगत सारथी, वही बजाता शंख।।
--
सरिता और तड़ाग के, सब ही जाते तीर।
मगर आचमन के लिए, गंगा का है नीर।।
--
देख दशा गोवंश की, ग्वाले हैं भयभीत।
कैमीकल के दूध में, मत खोजो नवनीत।।

--

6 टिप्‍पणियां:

  1. देख दशा गोवंश की, ग्वाले हैं भयभीत।
    कैमीकल के दूध में, मत खोजो नवनीत।। ...अब ग्वाले कहाँ अब तो व्यापारी हैं
    बहुत सटीक
    गाय को जाने क्या-क्या मिलता है खाने को शहर की सड़कों गलियारों में, दूध भी वैसे ही निकलेगा जैसा खायेगी

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 29.10.2020 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी|
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

    जवाब देंहटाएं
  3. सही कहा आपने की यदि गायो को खाने को ही अच्छा नही मिलेगा तो हमे दूध कहा से अच्छा मिलेगा।

    जवाब देंहटाएं
  4. --
    रक्खो कदम जमीन पर, मत उड़ना बिन पंख।
    जो पारंगत सारथी, वही बजाता शंख।।
    –वन्दन
    अनुकरणीय भावाभिव्यक्ति

    जवाब देंहटाएं
  5. सुंदर प्रेरक दोहे।
    सत्य सटीक।

    जवाब देंहटाएं

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