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शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2020

दोहे "शरद पूर्णिमा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

शरद पूर्णिमा पर हँसा, खुलकर आज मयंक।
गंगा जी के नीर की, दूर हो गयी पंक।।
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फसन घरों में आ गयीकृषक रहे मुसकाय।
अपने मन के छन्द कोरचते हैं कविराय।।
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हरी-हरी उगने लगीचरागाह में घास।
धरती से आने लगीसोंधी-तरल सुवास।।
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देख-देख कर धान कोखुश हो रहे किसान।
माता जी का हो रहाघर-घर में गुणगान।।
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पंचपर्व नजदीक हैंसजे हुए बाजार।
दूकानों में आज तोउमड़ी भीड़ अपार।।
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मिलता है भगवान केमन्दिर में सन्तोष।
माता जी का भुवन मेंगूँज रहा उद्घोष।।
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होता है अन्तःकरणजब मानव का शुद्ध।
दर्शन देते हैं तभीमहादेव अनिरुद्ध।।
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6 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (३१-१०-२०२०) को 'शरद पूर्णिमा' (चर्चा अंक- ३८७१) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    --
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह ! उमंग और उल्लास से भरे दोहे

    जवाब देंहटाएं
  3. हरी-हरी उगने लगी, चरागाह में घास।
    धरती से आने लगी, सोंधी-तरल सुवास।।
    --

    वाह बहुत सुंदर

    जवाब देंहटाएं
  4. सुंदर सौम्य आनंद से प्रफुल्लित करते सार्थक दोहे।

    जवाब देंहटाएं
  5. शरदपूर्णिमा पर्व पर विशिष्ट दोहे जो उल्लास और उत्साह का संदेश देते हैं। सादर प्रणाम।

    जवाब देंहटाएं

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