"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

फ़ॉलोअर

सोमवार, 26 अक्तूबर 2020

ग़ज़ल "कठिन बुढ़ापा होता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

--
बहता जल का सोता है 
हाथ-हाथ को धोता है 
--
फूल कहाँ से पायेगा वो 
जो काँटों को बोता है 
--
जिसके पास अधिक है होता
 
वही अधिकतर रोता है 
--
साथ समय के सब सम्भव है 
क्यों धीरज को खोता है  
--
फसल उगेगी कैसे अच्छी 
नहीं खेत को जोता है 
--
मुखिया अच्छा वो कहलाता 
जो रिश्तों को ढोता है  
--
धूप रूप” की ढल जाती तो
कठिन बुढ़ापा होता है  
--

8 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (27-10-2020 ) को "तमसो मा ज्योतिर्गमय "(चर्चा अंक- 3867) पर भी होगी,आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    ---
    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
  2. फूल कहाँ से पायेगा वो
    जो काँटों को बोता है
    --
    जिसके पास अधिक है होता
    वही अधिकतर रोता है

    –सत्य कथन
    सार्थक लेखन
    वंदन

    जवाब देंहटाएं
  3. आदरणीय सर ,
    आपकी जितनी रचनाएँ आज तक पढ़ीं हैं, वह सुंदर व सरल रूप से प्रेरणादायक संदेश देती है। इन्हें पढ़ कर कबीरदास जी के दोहे को पढ़ने जैसी अनुभूति होती है। पुनः बहुत ही सुंदर प्रेरणादायक रचना।
    आपसे अनुरोध है कृपया मेरे ब्लॉग पर भी आएं। आपके प्रोत्साहन एवं आशीष के लिए आभारी रहूंगी। मैं ने आपके ब्लॉग को फॉलो कर लिया है , अब यहाँ समय निकाल कर आपकी रचनाएँ पढ़ने के लिए आती रहूंगी। पुनः सादर नमन ।

    जवाब देंहटाएं
  4. प्रणाम शास्त्री जी, मुखिया अच्छा वो कहलाता
    जो रिश्तों को ढोता है ...अद्भुत काव्य और वो भी दोहे के स्वरूप में ...वाह

    जवाब देंहटाएं
  5. मुखिया अच्छा वो कहलाता
    जो रिश्तों को ढोता है ...वाह! लाजवाब सर।

    जवाब देंहटाएं
  6. आपकी तमाम रचनाएँ बेमिशाल हैं, चाहे दोहे हों या ग़ज़ल या और कोई साहित्यिक विधा - - नमन सह।

    जवाब देंहटाएं
  7. मुखिया अच्छा वो कहलाता।
    जो रिश्तों को ढोता है।।

    आदरणीय, बहुत अच्छा है छोटी बहर का यह शेर ...

    बिलकुल सही, घर के मुखिया को रिश्तों से समझौता करना पड़ता है, यदि उसे अपनी सज्जनता बरकरार रखनी हो...

    सादर,
    - डॉ. वर्षा सिंह

    जवाब देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails