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मंगलवार, 6 अक्तूबर 2020

वन्दना "अपना शीश नवाता हूँ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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शब्दों का भण्डार नहीं हैफिर भी कलम चलाता हूँ।
कोरे पन्नों को स्याही सेकाला ही कर पाता हूँ।।
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रूप” नहीं हैरंग नहीं है,
भाव नहीं हैछन्द नहीं है।
मेरे कागज के फूलों में,
कोई गन्ध-सुगन्ध नहीं है।
आड़ी-तिरछी रेखाओं सेअपनी फसल उगाता हूँ।
कोरे पन्नों को स्याही सेकाला ही कर पाता हूँ।।
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सिद्ध नहीं हूँसिद्धि नहीं है,
मस्तक तो हैबुद्धि नहीं है।
मिली मुझे बंजर वसुधा है,
जीवन तो हैऋद्धि नहीं है।
अँखियों के खारे पानी कोमुखड़े पर ढलकाता हूँ।
कोरे पन्नों को स्याही सेकाला ही कर पाता हूँ।।
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भूखा सारा कुटुम-कबीला,
कंगाली में आटा गीला।
कालचक्र है जटिल जलेबी,
धरती के ऊपर नभ नीला।
झंझावातों की चक्की में, मैं तो पिसता जाता हूँ।
कोरे पन्नों को स्याही सेकाला ही कर पाता हूँ।।
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मैं हूँ साधक तेरा माता,
तन-मन से तेरा उद्गाता।
आया हूँ मैं द्वारे तेरे,
दूर करो अब संकट मेरे।
तेरे चरणों में माता, मैं अपना शीश नवाता हूँ।
कोरे पन्नों को स्याही सेकाला ही कर पाता हूँ।।
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7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 08.10.2020 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी|
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

    जवाब देंहटाएं
  2. भूखा सारा कुटुम-कबीला,
    कंगाली में आटा गीला।
    कालचक्र है जटिल जलेबी,
    धरती के ऊपर नभ नीला।
    झंझावातों की चक्की में, मैं तो पिसता जाता हूँ।
    कोरे पन्नों को स्याही से, काला ही कर पाता हूँ।।

    -सार्थक सामयिक प्रस्तुति... वन्दन-साधुवाद

    जवाब देंहटाएं
  3. कलम का सतत चलते रहना ही परमात्मा की असीम कृपा है ।

    जवाब देंहटाएं
  4. शब्दों का भण्डार नहीं है, फिर भी कलम चलाता हूँ।
    कोरे पन्नों को स्याही से, काला ही कर पाता हूँ।।

    बहुत ही शानदार और सार्थक रचना

    जवाब देंहटाएं

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