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रविवार, 11 अगस्त 2013

"दुश्मन से लोहा लेना होगा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


मक्कारों से मक्कारी होगद्दारों से गद्दारी।
तभी सलामत रह पायेगीखुद्दारों की खुद्दारी।।

दया उन्हीं पर दिखलाओजो दिल से माफी माँगें,
कुटिलकामियों को फाँसी पर जल्दी से हम टाँगें,
ऐसा बने विधान देश काजिसमें हो खुद्दारी।
तभी सलामत रह पायेगीखुद्दारों की खुद्दारी।।

ऊँचा पर्वत-गहरा सागरहमको ये बतलाता है,
अटल रहो-गम्भीर बनोये शिक्षा देता जाता है,
डर कर शीश झुकाना ही तोखो देता है खुद्दारी।
तभी सलामत रह पायेगीखुद्दारों की खुद्दारी।।

तुम प्रताप के वंशज होउनके जैसा बन जाओ तो,
कायरता को छोड़पराक्रम जीवन में अपनाओ तो,
याद करो निज आन-बान कोआ जायेगी खुद्दारी।
तभी सलामत रह पायेगीखुद्दारों की खुद्दारी।।

कंकड़ का उत्तर हमकोपत्थर से देना होगा,
नीति यही कहतीदुश्मन से लोहा लेना होगा,
निर्भय होकर दिखलानी ही होगी अपनी खुद्दारी।
तभी सलामत रह पायेगीखुद्दारों की खुद्दारी।।

13 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर,मगर ये करेगा कौन ? सभी एक ही थाली के ….

    उत्तर देंहटाएं
  2. तुम प्रताप के वंशज हो, उनके जैसा बन जाओ तो,
    कायरता को छोड़, पराक्रम जीवन में अपनाओ तो,...

    सुन्दर ओज़स्वी गीत ... आज वैसे भी ऐसा समय है ... काश समय धारा मिएँ ये बदलाव आए ...
    नमस्कार शास्त्री जी ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. कब तक खामोश सहेंगे हम...खुद्दारी है तो लड़ कर सामना करेंगे हर चुनौती का...

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत प्रभावी और ओजस्वी.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुंदर !
    पर
    जो खुद हो गया हो मक्कार
    क्या होना है उसको ललकार !

    उत्तर देंहटाएं
  6. भाई साहब ! हम आप के साथ हैं आप के समर्थन के रूप में | सच है
    दुष्ट के साथ 'जैसे को तैसा ' |

    उत्तर देंहटाएं
  7. 'जैसे को तैसा ' बहुत सुन्दर देशभक्ति से प्रेरित रचना।

    उत्तर देंहटाएं

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