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शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

"याद आती रही" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


दिन गुज़रते गये, रात जाती रही।
खलबली ज़िन्दग़ी में मचाती रही।

धूप रौशन हुई, ताप इतना बढ़ा,
चाँदनी रात मन को जलाती रही।

ना मिलन की खुशी, ना बिछुड़ने का ग़म,
याद बरबस पुरानी सताती रही।

जब फ़लक में उठा बादलों का धुँआ,
राग बरसात अपना सुनाती रही।

फिर उमस बढ़ गयी, तन छटपटाने लगा,
स्वेद से देह भी चिपचिपाती रही।

शीत आया तो शीतल हवाएँ चलीं,
हड्डियाँ ठण्ड से कँपकपाने लगी।

माना मौसम में हैं खूबियाँ-खामियाँ,
वक्त की गड़बड़ी याद आती रही।

लालिमा तो कभी याद आती नहीं.
कालिमा रूप अपना दिखाती रही।

8 टिप्‍पणियां:

  1. मौसम के कैनवास पर यादों की सुंदर तस्वीर, वाह क्या बात है ......

    उत्तर देंहटाएं
  2. कभी कभी यादों में बहुत कुछ याद आ जाता है

    उत्तर देंहटाएं
  3. जीवन के जाने कितने ही विभिन्न रूप आते जाते हैं ...
    बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  4. मौसम के आनी जानी सी, अपनी एक कहानी है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. मौसम के आनी जानी सी, अपनी एक कहानी है,
    खुली धूप दिन, शीत निशा है और बरसता पानी है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी इस प्रस्तुति को शुभारंभ : हिंदी ब्लॉगजगत की सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुतियाँ ( 1 अगस्त से 5 अगस्त, 2013 तक) में शामिल किया गया है। सादर …. आभार।।

    कृपया "ब्लॉग - चिठ्ठा" के फेसबुक पेज को भी लाइक करें :- ब्लॉग - चिठ्ठा

    उत्तर देंहटाएं

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