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रविवार, 25 अगस्त 2013

"खरगोश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
रूई जैसा कोमल-कोमल,
लगता कितना प्यारा है।
बड़े-बड़े कानों वाला,
सुन्दर खरगोश हमारा है।।

बहुत प्यार से मैं इसको,
गोदी में बैठाता हूँ।
बागीचे की हरी घास,
मैं इसको रोज खिलाता हूँ।।

मस्ती में भरकर यह
लम्बी-लम्बी दौड़ लगाता है।
उछल-कूद करता-करता,
जब थोड़ा सा थक जाता है।।

तब यह उपवन की झाड़ी में,
छिप कर कुछ सुस्ताता है।
ताज़ादम हो करके ही,
मेरे आँगन में आता है।।

नित्य-नियम से सुबह-सवेरे,
यह घूमने जाता है।
जल्दी उठने की यह प्राणी,
सीख हमें दे जाता है।।

15 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया बाल रचना-
    आभार गुरु जी-

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत अच्छी लग रही है ये रचना मेरे बच्चों को.

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्यारा प्यारा सुन्दर सा खरगोश

    उत्तर देंहटाएं
  4. अर्थ और पशुप्रेम से संसिक्त बढ़िया रचना। सुन्दर सरल सीख देती रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  5. --
    "खरगोश"

    रूई जैसा कोमल-कोमल,
    लगता कितना प्यारा है।
    बड़े-बड़े कानों वाला,
    सुन्दर खरगोश हमारा है।।
    उच्चारण

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी इस उत्कृष्ट रचना की चर्चा कल मंगलवार २७ /८ /१३ को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका हार्दिक स्वागत है।

    उत्तर देंहटाएं

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