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मंगलवार, 13 अगस्त 2013

"ढंग हमारे बदल गये" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नजरों के साथ-साथ नज़ारे बदल गये
उतरेंगे कैसे पार, किनारे बदल गये

ज़न्नतनुमा वतन का ख्वाब चूर हो गया
आजाद क्या हुए कि सितारे बदल गये

कतरन मिली तो खिल उठा चेहरा बजाज का
गद्दी पे बैठ पंच-पियारे बदल गये

कैसे मिलेगी जहर से हमको निज़ाद अब
साँपों को पालने के पिटारे बदल गये

अब इन्कलाब आयेगा कैसे जुगाड़ में
हुब्बेवतन के सारे इदारे बदल गये

होने लगे विदेश के वो “रूप” पर फिदा
बदकिस्मती से ढंग हमारे बदल गये

12 टिप्‍पणियां:

  1. सही कहा !
    वाकई बदलने
    के साथ साथ
    उड़ भी गये हैं रंग
    क्या किया जाये
    जीने का अब
    आता है हमें
    पसंद यही ढंग !

    उत्तर देंहटाएं
  2. समय के साथ रंग और ढंग दोनों बदल गए हैं … बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना ....

    उत्तर देंहटाएं
  3. कैसे मिलेगी जहर से हमको निज़ाद अब
    साँपों को पालने के पिटारे बदल गये.सुन्दर अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  4. नमस्कार आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार (14 -08-2013) के चर्चा मंच -1337 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  5. कतरन मिली तो खिल उठा चेहरा बजाज का
    गद्दी पे बैठ पंच-पियारे बदल गये
    बहुत बढ़िया ! आज के वक्त की बिलकुल सही तस्वीर खींची है शास्त्री जी ! बहुत ही सशक्त अभिव्यक्ति !

    उत्तर देंहटाएं
  6. हर शब्द निरीहता और सच से सराबोर...अंतर को छूनेवाली रचना

    उत्तर देंहटाएं
  7. आज का समय केनवस पे उतार दिया हो जैसे ...
    लाजवाब और प्रभावी ...

    उत्तर देंहटाएं
  8. बिलकुल सही और सार्थक...ढंग हमारे बदल गए

    उत्तर देंहटाएं

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