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शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

"टिप्पणी में ग़ज़ल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरे आँगन में उतरे सितारे बहुत,
किन्तु मैंने मदद को पुकारा नहीं।

तक रहे थे मुझे हसरतों से बहुत,
मैंने हाँ भी न की और नकारा नहीं।

मेरी खुद्दारियाँ आड़े आतीं रहीं,
मैंने माँगा किसी से सहारा नहीं।

बस इसी बात का ही तो अफसोस है,
जो हमारा था वो भी हमारा नहीं।

अपने गम आँसुओं में बहाते रहे,
हमने तन और मन को सँवारा नहीं।

बन्दगी में कहा मैंने कुछ भी नहीं,
इसलिए उसने सोचा विचारा नहीं।

"रूप" ने टिप्पणी में  लिखी ये ग़ज़ल,
बून्द छोटी सी है जल की धारा नहीं।

15 टिप्‍पणियां:

  1. "रूप"ने टिप्पणी में लिखी ये ग़ज़ल,
    बून्द छोटी सी है जल की धारा नही।

    वाह वाह !!! क्या बात बहुत सुंदर गजल ,,,बधाई...

    स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाए,,,

    RECENT POST: आज़ादी की वर्षगांठ.

    उत्तर देंहटाएं
  2. मेरी खुद्दारियाँ आड़े आतीं रहीं,
    मैंने माँगा किसी से सहारा नहीं।
    वाह ...बहुत सुन्दर ग़ज़ल ....

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बढिया..सुन्दर ग़ज़ल ....

    उत्तर देंहटाएं
  4. गीत का प्रवाह है इस रचना में गजल कहो कुछ और कहो क्या फर्क पड़ता है रचना आखिर रचना है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. लाजवाब अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

    उत्तर देंहटाएं
  6. अपने गम आँसुओं में बहाते रहे,
    हमने तन और मन को सँवारा नहीं।

    उत्तर देंहटाएं
  7. शास्त्री जी...बहुत खुबसूरत अहसास !

    उत्तर देंहटाएं
  8. जैसा भी है, अपना जीवन,
    रसमय, मधुमय, सपना जीवन।

    उत्तर देंहटाएं
  9. "रूप" ने टिप्पणी में लिखी ये ग़ज़ल,
    बून्द छोटी सी है जल की धारा नहीं।
    ati sundar prastuti shastri ji

    उत्तर देंहटाएं
  10. खुबसूरत एहसास कराती एक सुंदर ...गजल

    उत्तर देंहटाएं

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