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बुधवार, 7 अगस्त 2013

"वतन में हर जगह बलवा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कहीं मन्दिर का है मसला, कहीं मस्जिद का है जलवा
मज़हब के नाम पर होता, वतन में हर जगह बलवा

सभी अपनी चलाते हैं, सियासत हो गई शातिर
रियाया के लहू से अब, चमन को सींचता कलुवा

शज़र जो दे रहा छाया, उसी की काटते शाखा
मिटाता आदमीयत जो, उसी का चाटते तलुवा

पुरानी सभ्यता पर अब, लगा है रोग शैतानी
हुआ परिधान अब नंगा, बदन को नोचता ठलुआ

दिया जो रूप कुदरत ने, उसी के साथ फितरत की
अमानत में खयानत कर, सितमग़र खा रहे हलुआ

13 टिप्‍पणियां:

  1. आप ने लिखा... हमने पढ़ा... और भी पढ़ें... इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना शुकरवार यानी 09-08-2013 की http://www.nayi-purani-halchal.blogspot.com पर लिंक की जा रही है... आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस हलचल में शामिल रचनाओं पर भी अपनी टिप्पणी दें...
    और आप के अनुमोल सुझावों का स्वागत है...




    कुलदीप ठाकुर [मन का मंथन]

    उत्तर देंहटाएं
  2. सामयिक स्थितियों का सटीक वर्णन

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 08-08-2013 के चर्चा मंच पर है
    कृपया पधारें
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  5. आज सवा दो मास के बाद अपने प्रिय चर्चा मंच पर आ कर कृतार्थ हो सका हूँ |थोड़ी बहुत उंगलियाँ चलने लगी हैं |
    प्रिय मित्र !आज आप की एक अच्छी सी रचना लम्बी अवधि के बाद पद कर कृतार्थ हुआ हूँ |
    सम्प्रदायवाद पर इसी तरह चोट होंती रहे तो कुछ अमन की आशा है |अब जुड़े रहने की आशा है|एक बड़ी भूल होने से बचा लिया है आप ने |

    उत्तर देंहटाएं

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