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गुरुवार, 22 अगस्त 2013

"तेरा उच्चारण थम जाये" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गीत चुराने वाले पामर! तू माँ का वरदान ना पाये।
इस जीवन में कभी न तुझको, कविता-छन्द बनाना आये।।

जो करता माँ का आराधन,
शब्दों का वो ही पाता धन,
नहीं चोर का उपवन खिलता,
सुख का वैभव कभी न मिलता,
जब चोरी का गीत सुनाए, तेरा उच्चारण थम जाये।
इस जीवन में कभी न तुझको, कविता-छन्द बनाना आये।।

जीवन भर जो चलता जाता,
वो ही तो मंजिल को पाता,
जो माता का है उद्गाता,
वो शब्दों की पौध उगाता,
पका-पकाया खाने वाले, तुझे भयंकर रोग सताये।
इस जीवन में कभी न तुझको, कविता-छन्द बनाना आये।।

कमल ढूँढता क्यों धारों में,
दीप जला ले अँधियारों में,
ज्ञान न बिकता बाजारों में,
ये मिलता गुरू के द्वारों में,
वो प्रसाद का अधिकारी है, जो चरणों में शीश नवाये।
इस जीवन में कभी न तुझको, कविता-छन्द बनाना आये।।

9 टिप्‍पणियां:

  1. क्या हुआ शास्त्री साहब. चलिये इसी बहाने कम से कम एक और अच्छा गीत तो पढ़ने को मिला.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. लगता है शास्त्री जी को वो बम्बईया एडवोकेट साहब याद आ गए :)

      हटाएं
  2. शुक्रिया आपकी टिपण्णी के लिए।

    पका-पकाया खाने वाले, तुझे भयंकर रोग सताये।
    इस जीवन में कभी न तुझको, कविता-छन्द बनाना आये।।
    गीत चुराने वाले पामर तेरी अम्मा खैर मनाये

    एच आई वी तुझको डस जाए।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत दिल से श्राप दिया है आपने...काश इसे वो पढ़ पाए!! आजकल इस तरह की चोरी खूब चल निकली हैं! हमने कहीं लिखा भी था:

    नकलचियों की दौड़
    अब फेसबुक/ब्लॉग पर भी चल रही है....
    परन्तु जनाब,
    असल तो असल है,
    उसी की फसल है,
    बाकी तो नकलची हैं,
    या फिर मात्र एक नक़ल है...

    चलिए आपका गीत मिला पढ़ने को, खूब आनन्द आया!
    सादर,
    सारिका मुकेश

    उत्तर देंहटाएं

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