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मंगलवार, 12 नवंबर 2013

"ठेंगा न सूरज को दिखाना चाहिए" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नेक-नीयत से हमेशा धन कमाना चाहिए
सादगी के साथ में जीवन बिताना चाहिए

कब तलक उन्मुक्त होकर पाप की नदिया बहे
आफतों के दौर कब तक इन्तजारी में रहें
झूठ का पाखण्ड-आडम्बर मिटाना चाहिए

हाय इकदिन बेजुबानों की असर दिखलायेगी
आबरू की ओढ़नी तब धूल में मिल जायेगी
दूसरों का छीन कर भोजन न खाना चाहिए

पाप से अर्जित ख़ज़ाने, आपने रक्खे कहाँ
सोच को बदलो सियासत के फकीरों अब यहाँ
देशहित में देश की दौलत लगाना चाहिए

लोकशाही में हमेशा लोक ही होता बड़ा
प्रजा का तो तन्त्र होता है प्रजा से ही खड़ा
जुगनुओं ठेंगा न सूरज को दिखाना चाहिए

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीयचर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  2. पाप से अर्जित ख़ज़ाने, आपने रक्खे कहाँ
    सोच को बदलो सियासत के फकीरों अब यहाँ
    देशहित में देश की दौलत लगाना चाहिए
    काश ऐसा हो
    सादर
    ~~

    उत्तर देंहटाएं
  3. कौवे मोती खा रहे हैं...जुगनू भी सूरज को ललकार रहे हैं...आपने आगाह कर दिया...शायद सुधर जाएं...

    उत्तर देंहटाएं
  4. सार्थक सोंच लिए बहुत ही बेहतरीन अभिव्यक्ति....
    :-)

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत प्रेरक रचना है, बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर व प्रेरित करती आपकी रचना , आदरणीय श्री शास्त्री जी को धन्यवाद
    सूत्र आपके लिए अगर समय मिले तो --: श्री राम तेरे कितने रूप , लेकिन ?
    * जै श्री हरि: *

    उत्तर देंहटाएं

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