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गुरुवार, 28 नवंबर 2013

"ग़ज़ल-आँखें कुदरत का उपहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

गुस्सा-प्यार और मनुहार
आँखें कर देतीं इज़हार 

नफरत-चाहत की भाषा का
आँखों में संचित भण्डार

बिन काग़ज़ के, बिना क़लम के
लिख देतीं सारे उद्गार

नहीं छिपाये छिपता सुख-दुख
करलो चाहे यत्न हजार

पावस लगती रात अमावस
हो जातीं जब आँखें चार

नहीं जोत जिनकी आँखों में
उनका है सूना संसार

“रूप” इन्हीं से जीवन का है
आँखें कुदरत का उपहार

8 टिप्‍पणियां:

  1. वाह...
    पावस लगती रात अमावस
    हो जातीं जब आँखें चार
    बहुत ही सुन्दर रचना....

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह ! बहुत सुन्दर रचना !
    नई पोस्ट तुम

    उत्तर देंहटाएं
  3. http://hindibloggerscaupala.blogspot.in/ की शुक्रवारीय २९/११/२०१३ की चोपाल पर आपकी रचना शामिल की गयी हैं कृपया अवलोकन हेतु पधारे .....धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  4. .. वाह ... बेहतरीन प्रस्‍तुति

    उत्तर देंहटाएं
  5. नींद चैन सब उड़ जाएगा ,

    मत करना तुम आँखें चार।

    सुन्दर भाव बोध की रचना है :

    /पाव स लगती रात अमावस
    हो जातीं जब आँखें चार

    नहीं जोत जिनकी आँखों में
    उनका है सूना संसार

    उत्तर देंहटाएं

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