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शनिवार, 23 नवंबर 2013

"तेजपाल का तेज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

दुख की बदली में घिरा, तेजपाल का तेज।
रास न आयी तरुण को, सोमा जी की सेज।।
--
अब जगजाहिर हो गया, तेजपाल का कृत्य।
पुलिस जाँच-पड़ताल से, साबित होगा सत्य।।
--
पत्रकारिता की मिली, मिट्टी में अब शाख।
मचा तहलका देश में, आग हो गयी राख।।
--
शोषण करता देह का, इज्जतदार समाज।
सम्पादक खुद लूटते, महिलाओं की लाज।।
--
धर्म वहाँ कैसे टिके, जहाँ घृणित हों काम।
काम-पिपासा बढ़ रही,  देख “रूप” का घाम।। 

10 टिप्‍पणियां:

  1. मिटटी करे पलीद अब, यही तरुण का तेज |
    गलत ख्याल वो पाल के, छोड़े अपनी मेज |
    छोड़े अपनी मेज, झुकाई कीर्ति पताका |
    करता नहीं गुरेज, बना फिरता है आका |
    करती महिला केस, हुई गुम सिट्टी पिट्टी |
    सोमा ज्यादा तेज, दोष पर डाले मिटटी ||

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर सर जी ,छद्म पत्रकारिता नें आज तेज को कहाँ से कहाँ ला पटका ,शर्म की बात है

    उत्तर देंहटाएं
  4. आप की ये सुंदर रचना आने वाले सौमवार यानी 25/11/2013 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है... आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित है...
    सूचनार्थ।

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  5. --
    शोषण करता देह का, इज्जतदार समाज।
    सम्पादक खुद लूटते, महिलाओं की लाज।।
    --
    धर्म वहाँ कैसे टिके, जहाँ घृणित हों काम।
    काम-पिपासा बढ़ रही, देख “रूप” का घाम।।

    शोषण करता देह का, इज्जतदार समाज।
    सम्पादक खुद लूटते, महिलाओं की लाज।।
    --
    धर्म वहाँ कैसे टिके, जहाँ घृणित हों काम।
    काम-पिपासा बढ़ रही, देख “रूप” का घाम।।

    पेज थ्री की लूट है लूट सके तो लूट ,

    बाहर बेहद शोर भाई अंदर से है मूट।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बेहतरीन दोहे ………सच्चाई को उकेरते हुये।

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुंदर.छद्म पत्रकारिता की कलई खोलती रचना.

    उत्तर देंहटाएं

  8. अति सुन्दर प्रासंगिक स्ट्रिंग आपरेशन सी धारदार रचना। शुक्रिया ज़नाब की सद्य टिप्पणियों का।

    उत्तर देंहटाएं

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