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मंगलवार, 12 नवंबर 2013

"अज्ञान के तम को भगाओ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


ज्ञान का इक दीप मन्दिर में जलाओ।
निलय से अज्ञान के तम को भगाओ।।

मन स्वदेशी है, स्वदेशी खाद-पानी चाहिए,
सुमन भू को उर्वरा फिर से बनाओ।

झाड़ और झंखाड़ सारे छील कर,
सुप्त मन में आस का अंकुर उगाओ।

छोड़ दो कर्कश विदेशी गान को,
प्यार के मृदुगान को अब गुनगुनाओ।

भाई-चारा वतन में क़ायम रहे,
नेकियों का एक गुलदस्ता सजाओ।

बन सको तो, नारियल जैसे बनो,
“रूप” अन्तस का जमाने को दिखाओ।

7 टिप्‍पणियां:

  1. बन सको तो, नारियल जैसे बनो,
    “रूप” अन्तस का जमाने को दिखाओ।
    बहुत सुंदर.

    उत्तर देंहटाएं
  2. छोड़ दो कर्कश विदेशी गान को,
    प्यार के मृदुगान को अब गुनगुनाओ।
    बन सको तो, नारियल जैसे बनो,
    “रूप” अन्तस का जमाने को दिखाओ।

    अति सुन्दर भाव और अर्थ अन्विति।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सार्थक सन्देश देती सुन्दर रचना..
    :-)

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुन्दर भाव ... ज्ञान का दीप तप सदा जलाए रखना चाहिए ...
    नमस्कार शास्त्री जी ...

    उत्तर देंहटाएं
  5. इस पोस्ट की चर्चा, बृहस्पतिवार, दिनांक :- 14/11/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" चर्चा अंक - 43 पर.
    आप भी पधारें, सादर ....

    उत्तर देंहटाएं
  6. अज्ञान की जगह ...ज्ञान का दीपक जरुरी है

    उत्तर देंहटाएं

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